भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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स्वसमवेदबोध

( १४३ )

साखी-ईटा पाथरते भरे, दीनो रूप सुँदाय । कहै तकी अबकी मरे, ऐसो करे खुदाय ॥

चौपाई

शेखतकी अल्लाह मनावै । अबकी बार न जीअत आवै ॥ हम पुनि गये शाहके पास । तबहि सिकन्दर वचन प्रकासा ॥

साखी-कहै सिकन्दर पीर सुन, किसको गाड़ो रूप । सो कबीर इहँ बैठ हैं, अदभुत ख्याल अनूप ॥

चौपाई

शेखतकी व्याकुल है बोले । नैन नासिका मस्तक डोले ॥ साखी-यहि जोलहाके पासमें, तारो गुटका आहि । ताते गाड़े नहीं मड़े, जरे न काटा जाय ॥ अब गहि कर पग बांधिके, हाथी देव हुलाय । हाथी धरि धरि चीरि है, तब कछु नाहि बसाय ॥ खूनी पील मँगायकै, दीन्हेसि मद्य पिलाय । कर पग बँधि हाथी हुले, हाथी चला पराय ॥ केतनो करै महाउत, गज सम्मुख नहीं आव । कहै तकी अब तोपके, मोहड़े राखि उड़ाव ॥ गोला दारू भरि दिहसि, राखे मोहड़े तोप । कहै कबीर सतनाम बल, निर्भय रहौ निशोक ॥ चले सिकन्दर निज घरे, हमकहँ लीने साथ । शेखतकी झूँसी रहे, शाह इलाहाबाद ॥

चौपाई

काशीके ब्रह्मन अरु काजी । मुरछि रहे सब हिरफत बाजी ॥ साखी-एक घौस गंगा तटे, बैठ सिकन्दर शाह । शेखतकी हमहू तहाँ, मुरदा यक बहा जाय ॥

नं. ९ कबीरसागर - ६