कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1520, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ें( १८४ )
बोधसागर
चौपाई
कहै तकी सुन फकर कबीरा । मुरदा फेर जिलावहु धीरा ॥
साखी-कहै कबीर गरीब हम, तुम बादशाहके पीर ।
मुरदा तुमहि जिलावहु, सतगुरु कहै कबीर ॥
चौपाई
शेखतकी चितवै चित लाई । अल्लह मुरदा देहु जिलाई ॥
साखी-अल्लह पीर मनाइया, शेखतकी बहु बार ।
मुरदा जिंदा न हुवा, बहिगो रेत मझार ॥
चौपाई
शेखतकी कह सुनो कबीरा । मुरदा तुमहि जिलावहु फीरा ॥
साखी-उठि मुरदाहि हम चितवा, दूरते नरे आय ।
कुदरत निर्भय नामके, मुरदा फेर जिलाय ॥
मुरदेको अस बोलेऊ, उठ कुदरत कम्माल ।
कर कुबड़ी धर टेकिऊ, सजि जिव भया सो बाल ॥
चौपाई
सुत कमाल कहि उत्तर दीना । उठि कमाल तब अस्तुति कीना ॥
गुरु सत्त जो कही कमाला । गुरु कबीर मोहि कीन निहाला ॥
साखी-कहै कमाल पुकारिके, गुरु हैं सत्य कबीर ।
मुरदेसे जिंदा किया, गन्दी गली शरीर ॥
शेखतकी मन मूछिके, कह धनि धन्य कबीर ।
तुम अल्लाह खुदाय हो, तुम मेरे गुरु पीर ॥
कहै कबीर सुन शेखजी, तुम औलियाकि जात ।
रोजा निमाज कर बंदगी, बैठो नबी जमात ॥
जो अल्लह फरमाया, सो नहिं करता कोय ।
हलाल हराम चीन्है नहीं, कैसे मुसलिम होय ॥