कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1521, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ेंस्वसमवेदबोध
( १४५ )
सारखी-जबतक दर्द पराई, दिलमें आवै नाहिं । कोटि बंदगी खता है, परै सो दोजखमाहिं ॥ जैसा दिल है आपना, तैसा सबका जान । दर्दमन्द अल्लह मिलै, कहै कबीर प्रमान ॥ शाह सिकंदर तकी मिलि, ठाढ़ भये करजोर । बकसो चूक कबीर तुम, जो कछु औगुन मोर ॥
चौपाई
कहै कबीर सुनो शाह प्यारे । तुम हमार कछु नाहिं बिगारे ॥ तुमरे पीर जो कसनी लीना । खरा खोट हम सबही चीन्हा ॥ हम नाहिं देहि बददुवा काहू । जो मम अरि हम सेवत वाहू ॥ हमरे मित्र दुष्ट कोइ नाहीं । सब हमरेमें हम सबमाहीं ॥ हम काहूको कहा सरापै । करै सो तैसो फल ले आपै ॥
सारखी-जैसो बीज कोइ बोइहै, तस फल चाखै आप । कह कबीर सत कहत हौं, मोहिं पुण्य नाहिं पाप ॥ कहर कुफुर दिल दोजखी, मोम दिलमें हर फकीर । निरभय नामसो समरथ, सतगुरु कहैं कबीर ॥
चौपाई
ऐसे कहि काशी चलि आये । धर्मदास तोहि सैन बुझाये ॥
सत्यकबीर वचन--चौपाई
रोग सोग बहु दुःख हटाये । केते परचाको देखलाये ॥ मृतकको दीनो जिव दाना । सो कछु इहां न करौं बखाना ॥ सोइ प्रसंग बढ़ुरि अब गार्ई । कलिमें जिमि प्रभु पंथ चलाई ॥ सत्य कबीरके शिष्य सुजाना । चार गुरु जो कीन प्रमाना ॥ तिनमें धर्मदास बड़ अंशा । वंश बयालिस जासु प्रशंसा ॥
बो० सा० १/