भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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स्वसमवेदबोध

( १४७ )

जो तुम कहो सोइ सो करऊं । वचन तुमार हृदयमें धरऊं ॥

सत्यकबीर वचन-चौपाई

सुन धर्मदास मैं सत्य बतावों । भवसागरको दुःख मिटावों ॥ सुन धर्मदास भक्ति पद उँचा । इहि सीठी कोइ विरला पहुँचा॥ योगी योग साधना करई । भवसागर तेऊ नहिं तरई ॥ दान देय सोई फल पावै । भवसागर भुक्तैको आवै ॥ तीर्थ नहाये जो फल होही । सर्व मर्म समझावों तोही ॥ जन्म लेय सुन्द तन पावै । संपति दौरि बहुरि जग आवै॥ ऊँचे घर लेवै औतारा । ब्राह्मण क्षत्रीको व्यौहारा ॥ इंद्री साधन है अति नीका । बिना भक्ति जानो सब फीका॥ इंद्री साधन है तप भारी । तामस तेज क्रोध हंकारी ॥ कोध किये गति मुक्ति न पावै । भक्ति महातम हाथ न आवै ॥ बर्त एक भक्तिको पूरा । और बर्त कीजै सब दूरा ॥ और बर्त सब यमकी फाँसी । भक्तीबर्त मिलै अविनाशी ॥ हरि अवराधनकी सुनि बाता । कहो भेद तुम सुनियो ज्ञाता ॥ हरिहर नाम सदा शिव केरा । तातै मिटे न भवको फेरा ॥ बहुत प्रेमते शिवको ध्यावै । रिध अरु सिद्ध द्रव्य बहु पावै॥ जो मन चित निश्चय करि धरई । गिरि कैलास में बासा करई ॥ फिरके काल झपेटै ताही । डारि देय भव चक्रर माही ॥

साखी-शिव साधनकी यह गति, शिव हैं भवके रूप ।

बिन समझे यह जक्त सब, पन्यौ महा भ्रमकूप ॥

चौपाई

हरिहर नाम विष्णुको भाखा । शुभ अरु अशुभ कर्म द्वे राखा॥ इनमें करे कलोल सदाई । करे भोग जीवन भरमाई ॥ बहुत प्रीतिसे विष्णुहि ध्यावै । सो जिव विष्णुपुरीमें जावै ॥ विष्णुपुरी सो निरभय नाही । फिरि कै डारि देइ भव माही ॥