भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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( १४८ )

बोधसागर

साखी-हरीहर नाम जो विष्णुको, जाने किय जिव जेर । चौरासी भरमै सदा, मिटै न भवको फेर ॥

चौपाई

हरिहर ब्रह्माको है नाऊँ । रजगुण व्यापि रहा सब ठाऊँ ॥ ब्राह्मणको पूजै संसारा । सो जिव होय न भवके पारा ॥

साखी-यहि तिनगुनकी भक्तिमें, मति भूलो भ्रमदास । इनके ऊपर निरगुन, तहाँ योगीको बास ॥

चौपाई

निर्गुण धाम निरञ्जन भाई । जिन सगरी उपपत्ति बनाई ॥ निर्गुणते मन भया प्रचंडा । ताते बसै सकल ब्रह्मण्डा ॥ निर्गुण अंश सकल औतारा । पीर पगंबर सब तन धारा ॥ यही निरञ्जनके पसारा । तामें अटका सब संसारा ॥ धर्मदास तुम भक्त सनेही । इनमें जनि अटकावो देही ॥ भक्त अनेक भये जग माहीं । निरभय घर कोइ पावत नाहीं ॥ भक्ति करे तब भक्त कहावै । भगतिसे रहित बचनको पावै ॥ चौदह लोक बसै भग माहीं । भगसे न्यारा कोई नाहीं ॥ सत्य नामकी खबरि न पाई । क्या करि भक्ति करो रे भाई ॥ जगमें भक्त दोय भै भारी । धू प्रहलाद सदा अधिकारी ॥ ये दोनों जन द्वै व्रत साधा । एकहि एक इष्ट आराधा ॥ ध्रुव तौ गृह तजि बाहर गयऊ । नारदको उपदेशी भयऊ ॥ छठे मास प्रकटे हरि आई । राज दियो वैकुंठ पठाई ॥ साठि हजार वर्ष करि राजू । कुट्टैब सहित वैकुंठ विराजू ॥ एक दौस जब परलय आई । ताहि बासते देय गिराई ॥ दुतिय भक्त प्रहलाद कहाई । इंद्रासनको सुख जो पाई ॥ स्वर्ग दोन चौकरी भुक्ती । बन्धनभावते भई न भुक्ती ॥

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