कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंस्वसमवेदबोध
( १६१ )
चौपाई
तीनों जहाँ होय संध्या । सो कबीर आचारको ठड़ा ॥ शौच अचार शुद्ध सब करनी । उज्ज्वल किया बइल्लव बरनी ॥ अंतर बाहर परम पुनीता । हिसा रहित कर्म चितचीता ॥ जस जैनी जिव दाया पाला । ताही सम कबीर मुनि चाला ॥ मुसलमानके जिमि अछाहा । ताहीते निज नेह निवाहा ॥ तिमि कबीर मुनिके सतनामा । रह लौलीन सदा सो तामा ॥ स्वसमवेद विधि करि शुभकर्मा । सार शब्द गहि पावै मर्मा ॥ सतगुन गहे बइल्लव ताते । भाषे परम पुरुषकी बातें ॥ शुद्ध भेष सब शुक्लाचारा । शुक्लवर्ण शुक्ले व्यौहारा ॥ शली टोपी तुलसी माला । कंठी कंठमें तिलक विशाला ॥ सूत्र रु शिखा बइल्लव बाना । योग युक्ति गुरुधर्म प्रमाना ॥ करकमंडल चोला पहिरे । चर्चा ज्ञानमाहिं बड़ गहिरे ॥ तत्त्वमाहिं निःतत्त्व बताई । झीना ज्ञान कथै ऋषिराई ॥ असन वसन विधिवत सो धरई । धर्मवस्तु कछु संग्रह करही ॥
इति
अथ तिलकस्वरूपवर्णन—चौपाई
ऊर्द्धपुण्ड्र अरु दंडाकारा । शुभ्रतिलक तेहि सोह लिलारा ॥ नासा अग्र भागते काढा । मस्तक अंत प्रयंत लो ठाढा ॥ नाकबांस दोउ भुकुटी बीते । मस्तक अंत प्रयंतलों खींचे ॥ दंडाकार सो तिलक बताई । तासु महामन कहो न जाई ॥ यमदंडनको दंडक दंडा । कर्म भर्म सो कर शतखंडा ॥ परम बइल्लव तिलक जो धारी । तिलक देखियम बिलखि सिधारी ताको अर्थ कहो किमि जाई । सुर नर मुनि कोइ पार न पाई ॥
बो० सा० ९/