भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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बोधसागर

दोय स्वरूप अकार बखाना । एक शूल यक सूक्ष्म जाना ॥ सूक्ष्म रूप अकार है एही । विष्णु विश्वंभर कहिये तेही ॥ स्वर व्यंजन द्वे भांतिके अक्षर । सबहीको मह पितु अकारबर ॥ स्वर अक्षरको आदि अकारा । सोई सर्व धर्म नय सारा ॥ स्थूलस्वरूप अकार जो कहिये । सकल स्वरनके आदिमें लहिये ॥ स्थूल रूप है जग विस्तारा । सूक्ष्म रूप रमै संसारा ॥ परम पुरुष है आदि अकारा । अमल अलेख अभेद अपारा ॥ आदि अकार जो गह्यो विकारा । ताते भयो सकल संसारा ॥ आदि अकारते तीनों गुन है । सतगुणरूप अकार विष्णु है ॥ शूल अकार विकार गहंता । सबही वर्णन माहिं रमंता ॥ वासुदेव सो रमै चराचर । लखि नहि परत सो अलख अगोचर ॥ संसृत महँ सोई आकारा । अछिफ पारसीमाहिं पुकारा ॥ सो अछिफ अछीह कहाया । ताहि अलिफते सबजम जाया ॥ ताकी सिफत कही नहि जाई । पीर पयंबर पार न पाई ॥ जो कोई अछिफ पहिचाना । ताही रूपमाहिं मिलि जाना ॥ चार खानि जेते जगमाहीं । बिना अछिफ कतहुँ कछु नाहीं ॥ कहुँ गुप्त कहुँ प्रकट निहारी । यह अछिफ सब माहिं बिहारी ॥ देखे ताहि कोइ कोइ साधू । जिनके हृदये ज्ञान अगाधू ॥ तेहि अछिफकी कथा अपारा । गिरा गनेश शेष कथिहारा ॥ नर बपुरा सो किहि विधि कहई । शिव सनकादिक मूक है रहई ॥ सत्य कबीरको तिलक है येही । वंशके साधु जो मस्तक देही ॥ इतर पंथको तिलक है न्यारे । वेद धर्मकी रीति बिचारे ॥

इति

अथ सत्यकबीरको धामक्षेत्र वर्णन—वार्ता

सहज सुरति संप्रदा धीरज धाम दशमद्वार त्रिपुटी तीरथ ॥