भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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वसमवेदबोध

( १६९ )

जब सतगुरुको निज तन त्यागे । कौन धर्म प्रभुको सुभ लागे ॥ हिंदू कैधौ मूसलमाना । मृत्युकर्म किहि विधिते ठाना ॥ तब कबीर तेहि उत्तर देऊ । जौ तुम लोथ हमारी लेऊ ॥ तौ अपनी कुलरीति विचारा । मृत्युकर्म कर तेहि अनुसारा ॥ पुनि गुरु बीरसिंह गृह गयऊ । राजा रानी हर्षित भयऊ ॥ चादर तानके पौढ़े जाई । भये अबोल कबीर गोसाई ॥ राजा रानी जब अस लखेऊ । बिकल भये सतगुरु तन तजेऊ ॥ रुदन करे जब राजा रानी । नग्र शोर भा लोगन जानी ॥ बिजुलीखां नृपको गुरुभाई । सुनत खबर तुरितै उठि धाई ॥ बीरसिंहसे बचन सुनावो । सतगुरु लोथ हमैं देखलावो ॥ नृप गुरुलोथ जो परगट कीन्हा । बिजुलीखां तेहि जोरसे लीना ॥ ले भाग्यौ सो गाड़ौ जाई । राय बीरसिंह तब रिसियाई ॥ लै निजु सैन संग तेहि बेला । चढे बीरसिंह राय बघेला ॥ दोनों दिशिते दल उमड़ाने । एक न कहा एकको माने ॥ जब घमसान होनेपर भयऊ । तब अकाशबानी अस कहेऊ ॥

कवित्त

अकथ कहानी तहैं बोले नभबानी सुनो, दोहु दल ज्ञानी ॥ जिव हानीमें न दीजिये । बिज्लीखां पठान कह ठाढे हो पठान ॥ पीर, सिंहजी बघेल दहपेल मति कीजिये ॥ हाड चाम देह ॥ जन्म मरन न पीर ऐसो, साहिब कबीर सत्य बातको पती- जिये । कबुर खुदाय नहिं लोथ कहुँ पाय कछु, तहैं दरसाय दोऊ भाग करि लीजिये ॥

बोपाई

यह सुनि दोनों रह ठहराई । तब चलिके सो कबुर खुदाई ॥ अस अचरज तहैं देख्यो जाई । कतहुँ लोथ गुरु दधि न आई ॥