कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1544, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ें( १६८ )
बोधसागर
अथ नरक वर्णन--चौपाई
प्रथमहि जल रंगी कहि गाया । ताके ऊपर कूर्म बताया ॥ कूर्मके ऊपर मीन कहीते । मीनके ऊपर कच्छप थीते ॥ कच्छपपर बाराह बखाना । तापर शेष नाग अस्थाना ॥ शेषनाग निज शिरपर धारा । पृथ्वी सहित सकल महिभारा ॥ सात नरक चौरासी कुंडा । पर तामें पापिनको झुंडा ॥ तहुँ यमदूत ताडना करही । दंड प्रचंड जीव दुख भरही ॥
इति
अथ चौदह यमके नाम
दोहा-मृत्यु शृंग प्रथमै कहो, कोधित अंध बताय । दुगदानी तीजे कहो, मन मकरंद जताय ॥ चित्तचंचल पंचम गनौ, छठे अपर्बल नाम । अंध अचेत है सप्तमै, कर्मरेख पुनि मान ॥ अग्निघंट नौमै कहो, कालसेन पुनि चीत । मनसा मलई ग्यारहै, बरहे कह भयभीत ॥ पुनि तालुका है तेरहै, सूरधार दशचार । यमगन जेते नरकमै, ये चौदह सरदार ॥
इति
अथ सत्यकबीरके गुप्त होनेका वर्णन--चौपाई
संवत पंद्रहसौ उनहतर । देश उदैसे सतगुरु पगधर ॥ पुनि मगहर चलिगे गुरुदेवक । हिंदू मुसलमान जहँ सेवक ॥ बीरसिंह नरनाथ बघेला । सत्तकबीरको सो तहँ चेला ॥ बिजुलीखाँ पठान सोऊ राजा । शिष्य कबीरको तहां विराजा ॥ बिजुलीखाँ जब यह सुनि पाई । अब गुरु जगसे जाहि लुपाई ॥ तब तासे पूछौ सो भेवा । हिंदू मुसलमान गुरुदेवा ॥