भारतकोश
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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

( १६८ )

बोधसागर

अथ नरक वर्णन--चौपाई

प्रथमहि जल रंगी कहि गाया । ताके ऊपर कूर्म बताया ॥ कूर्मके ऊपर मीन कहीते । मीनके ऊपर कच्छप थीते ॥ कच्छपपर बाराह बखाना । तापर शेष नाग अस्थाना ॥ शेषनाग निज शिरपर धारा । पृथ्वी सहित सकल महिभारा ॥ सात नरक चौरासी कुंडा । पर तामें पापिनको झुंडा ॥ तहुँ यमदूत ताडना करही । दंड प्रचंड जीव दुख भरही ॥

इति

अथ चौदह यमके नाम

दोहा-मृत्यु शृंग प्रथमै कहो, कोधित अंध बताय । दुगदानी तीजे कहो, मन मकरंद जताय ॥ चित्तचंचल पंचम गनौ, छठे अपर्बल नाम । अंध अचेत है सप्तमै, कर्मरेख पुनि मान ॥ अग्निघंट नौमै कहो, कालसेन पुनि चीत । मनसा मलई ग्यारहै, बरहे कह भयभीत ॥ पुनि तालुका है तेरहै, सूरधार दशचार । यमगन जेते नरकमै, ये चौदह सरदार ॥

इति

अथ सत्यकबीरके गुप्त होनेका वर्णन--चौपाई

संवत पंद्रहसौ उनहतर । देश उदैसे सतगुरु पगधर ॥ पुनि मगहर चलिगे गुरुदेवक । हिंदू मुसलमान जहँ सेवक ॥ बीरसिंह नरनाथ बघेला । सत्तकबीरको सो तहँ चेला ॥ बिजुलीखाँ पठान सोऊ राजा । शिष्य कबीरको तहां विराजा ॥ बिजुलीखाँ जब यह सुनि पाई । अब गुरु जगसे जाहि लुपाई ॥ तब तासे पूछौ सो भेवा । हिंदू मुसलमान गुरुदेवा ॥

वसमवेदबोध

( १६९ )

जब सतगुरुको निज तन त्यागे । कौन धर्म प्रभुको सुभ लागे ॥ हिंदू कैधौ मूसलमाना । मृत्युकर्म किहि विधिते ठाना ॥ तब कबीर तेहि उत्तर देऊ । जौ तुम लोथ हमारी लेऊ ॥ तौ अपनी कुलरीति विचारा । मृत्युकर्म कर तेहि अनुसारा ॥ पुनि गुरु बीरसिंह गृह गयऊ । राजा रानी हर्षित भयऊ ॥ चादर तानके पौढ़े जाई । भये अबोल कबीर गोसाई ॥ राजा रानी जब अस लखेऊ । बिकल भये सतगुरु तन तजेऊ ॥ रुदन करे जब राजा रानी । नग्र शोर भा लोगन जानी ॥ बिजुलीखां नृपको गुरुभाई । सुनत खबर तुरितै उठि धाई ॥ बीरसिंहसे बचन सुनावो । सतगुरु लोथ हमैं देखलावो ॥ नृप गुरुलोथ जो परगट कीन्हा । बिजुलीखां तेहि जोरसे लीना ॥ ले भाग्यौ सो गाड़ौ जाई । राय बीरसिंह तब रिसियाई ॥ लै निजु सैन संग तेहि बेला । चढे बीरसिंह राय बघेला ॥ दोनों दिशिते दल उमड़ाने । एक न कहा एकको माने ॥ जब घमसान होनेपर भयऊ । तब अकाशबानी अस कहेऊ ॥

कवित्त

अकथ कहानी तहैं बोले नभबानी सुनो, दोहु दल ज्ञानी ॥ जिव हानीमें न दीजिये । बिज्लीखां पठान कह ठाढे हो पठान ॥ पीर, सिंहजी बघेल दहपेल मति कीजिये ॥ हाड चाम देह ॥ जन्म मरन न पीर ऐसो, साहिब कबीर सत्य बातको पती- जिये । कबुर खुदाय नहिं लोथ कहुँ पाय कछु, तहैं दरसाय दोऊ भाग करि लीजिये ॥

बोपाई

यह सुनि दोनों रह ठहराई । तब चलिके सो कबुर खुदाई ॥ अस अचरज तहैं देख्यो जाई । कतहुँ लोथ गुरु दधि न आई ॥

( १७० )

बोधसागर

कबुरमें चादर पुष्प सो पाई । ले दोनों द्वे भाग बनाई ॥ मुसलमान तेहि कबुरमें धरेऊ । हिंदू ले समाधसो करेऊ ॥ हिंदुनके कबीर चौरा है । तुरकनके कबीर रोजा है ॥ इत हिंदू सेवै गुरुदेवा । सुरशिद मुसलमान उत सेवा ॥ बालरूप जब गुरु प्रकटाना । कमलपुष्पमें कर निज थाना ॥ अंतकाल जब गयौ दुराई । गौरमें सोइ पुष्प देखलाई ॥ आदि अंत जाके नहिं देही । जन्म मरण कबहुँ नहिं तेही ॥ सकल विकार तो जो प्रभुपारा । जीवकाज तनधर संसारा ॥ सह्यौ निरादर दुःख अधिकार्ई । निज दासनको दास कहाई ॥ सो सब जीव हेतको दीसा । समरथ परमगुरु जगदीशा ॥ कबुर बीचते गये लोपाई । मथुरा नग्रमें पहुँचे जाई ॥ नीरू नीमा जोलह जोला ही । तन तजिके परकटभे ताही ॥ दोनोंको निज शब्द गहाई । जाते भवनधि फेर न आई ॥ मथुरा नग्रते बहुरि सिधाई । धर्मदास ढिग सतगुरु आई ॥ धर्मदासहि बहु भांति शिखाई । सहितदेह पुनि गयौ लोपाई ॥ महा कठिन युग कलियुग होई । शुभ करनी जिव करे न कोई ॥ यज्ञ योग जप तप व्रत दाना । भावन भक्ति विषय लपटाना ॥ तिनको काज कौन बिधि सुधरे । बिन कबीर गुरु पार न उतरे ॥ दयासिंधु तेहि पार लँघावै । सत्यकबीर कि सरन जो आवै ॥

सत्यकबीर वचन

बावन बीर कबीर कहावो । कलियुगकेर जीव सुत्तावो ॥

इति

अथ स्वसमवेदकी स्फुटवार्ता-चोपाई

एकलक्ष अरु असी हजारा । पीर पयंबरको औतारा ॥ सो सब आहि निरंजन वंशा । तन धरि धरि निज पिता प्रसंशा ॥ दश औतार निरंजन केरे । राम कृष्ण सबमाहि बडेरे ॥

स्वसमवेदबोध

( १७१ )

पूरन आप निरंजन होई । यामें फेरफार नहीं कोई ॥

दोहा—पांच सहस्र अरु पांचसौ, जब कलियुग वित जाय ।

महापुरुष फरमान तब, जग तारनको आय ॥

हिन्दु तुर्क आदिक सबै, जेते जीव जहान ।

सत्य नामकी साख गहि, पावैं पद निर्वान ॥

यथा सरितगण आपही, मिलैं सिन्धुमें धाय ।

सत्य सुकृत के मध्ये तिम्भि, सबही पंथ समाय ॥

जबलगि पूरण होय नहीं, ठीकेको तिथि वार ।

कपट चातुरी तबहिलों, स्वसमवेद निरधार ॥

सबहिं नारि नर शुद्ध तब, जब टीका दिन अंत ।

कपट चातुरी छोड़िके, शरण कबीर गहंत ॥

एक अनेक न है गयो, पुनि अनेक हो एक ।

हंस चलै सतलोक सब, सत्यनामकी टेक ॥

घर घर बोध विचार हो, दुर्मति दूर बहाय ।

कलियुगमें इक है सोई, बरते सहज सुभाय ॥

कहा उग्र कह छुद्र हो, हर सबकी भवभीर ।

सो समान समदृष्टि है, समर्थ सत्य कबीर ॥

बिनय—बोपाई

बिन्ती करौ संत गुरु पाहीं । जो मम दोष न हृदय गहाहीं ॥

निज अपराध कहौ किन खोली । कहूँ कहूँ मैं बदल्यो गुरु बोली ॥

मम बानी अरु सद्गुरु बानी । दोनों यहि मत मेले सानी ॥

जहैं जस उचित देख तस कीना । सूक्ष्म गुरु वाणी गहि लीना ॥

मेरो दोष न कछु तहैं लेखब । सत्य कबीरकी बानी देखब ॥

सत्य कबीरको ग्रन्थ निहारा । सब कछु लिख्यो ताहि अनुसारा ॥

इति श्रीस्वसमवेद धर्मबोध समाप्त

A decorative border consisting of a repeating pattern of stylized leaves or scalloped shapes, forming a rectangular frame around the central illustration.

A botanical illustration of a plant with two flowers and a long, pointed seed pod. The plant has a central stem with several small, lanceolate leaves. Two flowers are shown: one is a daisy-like flower with a central disk and many small petals, and the other is a smaller, more compact flower. A long, slender, pointed seed pod (silicle) is attached to the stem above the flowers.

अथ धर्मबोध प्रारंभ

भारतपथिक कवीरपंथी-

स्वामी श्रीयुगलानन्दजीद्वारा संशोधित

भारत का विकास

एकलव्य शर्मा

भारत का विकास (1947-1950)

विज्ञान

सत्यनाम

A black and white woodcut-style illustration of Sri Kabir Sahib seated on a throne. He is wearing a tall, pointed turban and a long robe, holding a rosary. A halo surrounds his head, and a decorative lamp is positioned above him. A small pot is on the floor to his left.

श्री कबीर साहिब

नं. ९ कबीरसागर - ७

STAMP

A large, faint, and illegible illustration or stamp is centered on the page. It appears to be a rectangular or oval-shaped emblem, possibly containing text or a figure, but the details are too faded to discern. The overall appearance is that of a watermark or a faded official seal.

STAMP

सत्यसुकृत, आदिअदली, अजर, अचिन्त, पुरुष, मुनीन्द्र, करुणामय, कबीर, सुरति योग, संतान, धनी, धर्मदास, च्छरामणिनाम, सुदर्शन नाम, कुलपति नाम, प्रबोध गुरुवालापीर, केवल नाम, अमोल नाम, सुरतिसनेही नाम, हकनाम, पाकनाम, प्रकट नाम, धीरज नाम, उग्र नाम, दयानाम की दया, वंश ब्यालीसकी दया ।

अथ श्रीबोधसागरे

त्रिशतमस्तंरंगः

धर्मबोध प्रारम्भः

गृहीधर्म वर्णन

दोहा—गृहाश्रमीके धर्मको, वर्णन करें सुजान । जिहि आश्रम आश्रम सकल, आश्रम कतहुँ न आन ॥ सांझ सकार मध्याह्नको, सन्ध्या तीनों काल । धर्म कर्म तत्पर सदा, कीजै सुरति सँभाल ॥

बो • ला • ९/

( १७८ )

बोधसागर

कोटिन कंटक घेरि ज्यों, नित्य क्रिया निज कीन । सुमिरन भजन एकांतमें, मन चंचल गहि लीन ॥ साधू गुरु सेवा करे, श्रद्धा प्रेम सहीत । देव परम प्रभु ध्यावई, करि अतिशय मन प्रीत ॥ तन मन साधु जो सेवई, जपे निरंतर नाम । गृही सो पावै परमपद, योग समाधि न काम ॥ पुरुष यती सो जानिये, निज तिय तीय विचार । मात बहिन पुत्री सकल, औरी जो जग नार ॥ तिय ऐसो व्रत धर्मधर, निज पति सेवत जोय । इतर पुरुष जे जगतमें पिता भ्रात सुत होय ॥ पतिकी आज्ञामें रहै, निज तन मनते लाग । पिय विपरीत न कछु करे, ता तियको बड़ भाग ॥ मनकामना विहायके, हर्षसहित कर दान । सो तन मन निर्मल भया, होय पापकी हान ॥ यज्ञ दान बिन गुरु करे, निशि दिन माला फेर । निष्फल है करनी सकल, सतगुरु भाषे टेर ॥ प्रथमै गुरुसे पूछिये, कीजै काज बहोर । सो सुखदायक होत है, मेटे जिवका खोर ॥ अभ्यागत आगम निरखि, आदर मान समेत । भोजन छाजन बित यथा, सदा काल जो देत ॥ सोई म्लेच्छ सम जानिये, गृही जो दान विहीन । यहि कारण नित दान कर, जो नर चतुर प्रवीन ॥ पात्र कुपात्र विचारिके, तब दीजै तेहि दान । देता लेता सुख लहै, अन्त होय नहिं हान ॥ भूखा साधु भिखारि कोइ, नहिं आवे जब द्वार ।

धर्मबोध

( १७९ )

तादिन मन पछतात बहु, करत अकेल अहार ॥ भोजनपाक निहारिके, इत उत द्वारे झांक । अभ्यागत भूखा निरखि, मारे तत्क्षण हांक ॥ विन हरिकृपा न सन्त मिल, संत मिलन सुखसार । तिनके आश्रय मुक्ति गति, सङ्कट सकल निवार ॥ गृही होय तो भक्ति कर, नातो करू वैराग । दोहु भावते एक गहु, थोथी कथनी त्याग ॥ फल कारण सेवा करे, निशि दिन याचे राम । कह कबीर सेवक नहीं, चहै चौगुना दाम ॥ सज्जन सगे कुटुम्ब हितु, जो कोई द्वारे आव । नहीं निरादर कर कोई, राखे सबको भाव ॥ रहे सदा निज गेहमें, सुमिरनमें लौलीन । ऐसे गृहीको काम कह, करवा अरु कौपीन ॥ कौड़ी कौड़ी जोरिके, कीने लक्ष करोर । कौड़ी एक न सँग चले, केतो दाम बटोर ॥ जो धन हरिके हेत नहीं, धरम राह नहीं जात । सो धन चोर लबार गह, धर छातीपर लात ॥ सतको सौदा जो करे, दम्भ छिद्र छल त्याग । अपने भागको धन लहै, परधन विषसों लाग ॥ भूखा जेहि घरते फिरे, ताको लागे पाप । गृही पाप ले जात है, पाप आपनो थाप ॥ साधु न जेवैं जाहि घर, ता घर जेवैं भूत । कलिमल ग्रसित सो जानिये, छुटै न कबहुँ छूत ॥ गृही भक्त निज धर्मरत, ताको साधु विचार । परमप्रीति जेहि साधुते, परम धर्म धन धार ॥ प्रथमहि साधु जैवाइये, पीछे भोजन भोग ।

( १८० )

बोधसागर

ऐसे पापको टालिये, कटे नित्यको रोग ॥ जाके सुख सब धाम है, मन विरक्त हो जाहि । गृही सो साधू जानिये, दाग न लागे ताहि ॥ जो सुत बित मिथ्या लखे, दुख सुख एक समान । परम भक्त सो गृही सोइ, पावै पद निर्बान ॥ हरिपद प्रीति लगाइये, औरते तजि निर्वाह । गृही होय कै साधुते, यही तरनकी राह ॥ यद्यपि उत्तम कर्म करि, रहै रहित अभिमान । साधु देखि शिर नावते, करते आदर मान ॥ बार बार निज श्रवणते, सुने जो धर्म पुरान । कोमल चित्त उदार नित, हिंसा रहित बखान ॥ न्याय धर्म युत कर्म सब, कर न कबहुँ अन्याय । जे अन्यायी लोग हैं, बांधे यमपुर जायँ ॥ सरल सुभाव रहे सदा, कोह द्रोह न विषाद । प्रीति शुद्ध सत गुन गहे, संतत संत प्रसाद ॥

अर्थ—जो कोध द्रोह और मिथ्या विचारसे रहित होकर कपट रहित सन्तोंकी कृपा चाहता है वह सन्तोंकी दयासे शांत शुद्ध सत्य और पुण्य रूप पदार्थ सत्यपर पारखको प्राप्त होता है ।

साथा लाभ संतोष कर, तृष्णा तरल तरंग ॥ उठन न पावै हृदयमें, कीजै ज्ञानते भंग ॥ गृही साधु दोउ जानिये, चक्र धर्म रथकेर ॥ दोहु बिन कारज ना सरे, मिलके कलिमल पेर ॥

१ पुरान कथा, धर्म निर्णय जिसके अन्दर लिखा हो और जिसमें धर्मवीरोंकी कथा हो ।

धर्मबोध

(१८१)

गृहकारजमें पाप बहु, नित लागे सुनु लोय । ताहित दान अवश्य है, दूर ताहिते होय ॥ चक्की चौका चूल्ह महँ, झाडू अरु जलथान । गृह आश्रमीको नित्य यह, पाप पंचविधि जान ॥ और युगनमहँ गृही कर, योग यज्ञ मख जाप । कलिमें सो कछु होय नहिं, कटे दानते पाप ॥ यथायोग जग लोग सब, बिन सम कीजे दान । कह राजा कह रंक है, दोनों एक समान ॥ जो धन पाय न धर्मरत, नहीं दान व्यवहार । सो शिर पावँको भारभरि, बंधे यमपुर द्वार ॥ गुरुजन जो परिवारके, कर आदर सतकार । लघु गुरुलोग जो योग जस, कुलको पालनहार ॥ पुत्र पौत्र बनितादि जे, इतर जेते लघु देख । भलो सिखावन दीजिये, जाते भला बिसेख ॥ जो गुरुजन परिवारके, लघुको सीख न देत । जो कछु औगुन सो करे, अघ शिर अपने लेत ॥ सोई मित्र सोई सगा, भल शिख शिशुहि दिखाव । तरुण अवस्था सुख लहै, गुरुजन सीख प्रभाव ॥ मारि ताड़िकै हठ किये, बाल अधर्मका राह । शुभगुण ज्ञानके पंथमें, बांधि चलाओ ताह ॥ मातु पिता सो शत्रु है, बाल पढ़ावै नाहिं । हंसनमें बकला यथा, तथा सो पण्डितमाहिं ॥ पहिले अपने धर्मको, भली भांति सिखलाय । अन्य धर्मकी सीख मुनि, भटकि बालबुधि जाय ॥ अपनो धर्म न जानेऊ, सीख्यो न्यारो धर्म ।

( १८२ )

बोधसागर

अज्ञानी यहि विधि किते, भूलि ते गह्यौ अकर्म ॥ जेते गृही हैं जगतमें, निज निज घरके भूप । हुकुम चले निज भौनमें, भूपतिके तद्रूप ॥ जिमि नृप चढै बजायके, धरती बस कर लेय । परजा सब तेहि बश भये, बिनयते भूपति सेय ॥ इमि सब गृही निशान दे, व्याहको सजै बरात । भूमि नारि लहि प्रजाभे, सुत सुतादि लघु जात ॥ जो कछु धनको लाभ हो, शुद्ध कर्माई कीन । धनतेदशवें अंशको, अपने गुरुको दीन ॥ जो गुरुनिकट निवास कर, तो सेवा कर नित्त । जो कहैं दूर अनत बसे, ध्यान करे करि हित्त ॥ छठे मास गुरुदरश कर, सेवा कर निज वश्य । छठे मास जो पहुँच वर्हि, वर्षमें करो अवश्य ॥ गुरु विरक्त जो लेइ नहिं, शिष्य निज आरतदेह । गुरु आज्ञा अनुसार तो, दान पुण्य कर देइ ॥

अथ गृहस्थकर्तव्येषु लक्षण

सत्यबचन प्रथमे कहो, दुतिये दया बताय । तीजो तप चौथे शौच, दोनो भांति कराय ॥ बाहर जलते शौच कर, अन्तर ज्ञान के द्वार । पचये तितिशा इच्छा, षट सतसंत निरुवार ॥ सप्तम सम दम अष्टमे, नवम अहिंसा होय । ब्रह्मचर्म्य दशमें कहा, त्याग एकादश जोय ॥ बरहैं स्वाध्यायहि कहो, अरु तेरहैं मृदु चित्त । चौदह तोष पुनि पंद्रहैं, साधु सेव करे नित्त ॥ विषयत्यागकर सोलहैं, सत्रहे वृथा सुखोपाय ।

१ सत्यसत्य ।

धर्मबोध

( १८३ )

मौन अठारह सो कहा, वृथा बोल न गवाय ॥ ऊनविंश इस देहसे, आतम न्यारा जान । विसवें जो अन्नदि कछु, बांटिके भोजन पान ॥ ब्रह्म इकिसवें सर्वमय, नरमें निरख विशेष । वाइसवें पुनि श्रवण कह, तेइस कीर्तन लेख ॥ स्मृति चौविंश पच्चीसवें, पूजा सेवन छबीश । बन्दन दास्य अठाइसे, सरुय स्वार्पणा तीस ॥

इति ३० लक्षण

केते जनकादिक गृही, जो निज धर्मप्रवीन । पायो शुभगति आपहू, औरनहू गति दीन ॥ हरिके हेतु न देत धन, देत कुमारगमाहिं । ऐसे अन्यायी अधम, बांधे यमपुर जाहिं ॥ जो दीने सो पाइहै, लुनै जो बोया बीज । जो नहिं बोया बीज है, पावै नहिं कछु चीज ॥ गाडा धन छाडा वृथा, जो दीना सो मोर । क्रूर विचार करे नहीं, लगे न हरिकी ओर ॥ निज धनके भागी जिते, सगे बन्धु परिवार । जैसा जाको भाग है, दीजै धर्म सँभार ॥ अपने भागको लीजिये, है हराम पर हक्क । सूकर गायकी सौंहपर, अहक्क ओर जनि तक्क ॥ गह्यो सुदामा भाग हरि, भयो महा कंगाल । और भाग विषसों तजो, धर्मनीति निजुपाल ॥ तन मन धन हरि हेत दे, चेत भक्ति कर प्रीति । यहि संसार असार लखि, चल जनकी विपरीति ॥

१ सुमिरन । २ आत्मसमर्पण ।

( १८४ )

बोधसागर

धन मन तन सब जायगो, रहे न जो कछु दीस । मूरख वृथा गवाँव सो, भक्ति भजे जगदीश ॥ महातिमिर घेरे हृदय, विषयभोग लपटान । सुमति न आई अजौं उर मरनकाल नियरान ॥ खाट परे तब झरखई, नयनन आवे नीर । तब कछु यतन बनै नहीं, तनु व्यापे मृतु पीर ॥ देखे जब यमदूतको, ठाढ भे सन्मुख आय । महाभयंकर भेष लखि, इत उत जीव लुकाय ॥ सकल शिथिल इन्द्री भई, रहा न कोई ओट । अब कहैं भागिकै जाइहौ, यमगण पकरी झोंट ॥ पुण्य भजन कीना नहीं, नहि संतनसे हेत । बार बार पछतात मन, चिड़िया चुन गई खेत ॥

इति गृहीधर्मका वर्णन समाप्त

अन्य गृहीधर्म वर्णन

( कबीर संग्रह )

दोहा—जो मानुष गृहधर्म युत, राखे शील विचार । गुरुमुख वाणी साधु सँग, मन वच सेवा सार ॥ सेवक भाव सदा रहे, अहम न आने चित्त । निर्णय लखे यथार्थ विधि, साधुनको कर मित्त ॥ सत्य शील दाय़ा सहित, बरते जगव्यवहार । गुरु साधुके आश्रित, दीन बचन उच्चार ॥ बहु संग्रह विरुष्यानके, चित्त न आवे ताहि । मधुकर इव सब जगतमें, घटि बढ़ि लखि बर्ताहि ॥ प्रीति सदा गुरु पारख करई । संगति साधु सदा आचरई । उत्तम मध्यम जग व्यवहारा । निर्णयसहित करे अनुसारा ॥

धर्मबोध

( १८५ )

दोहा-गृहीधर्म बड़ खटपट, तामें रहि हुशियार । लोक वेदकी रीति सब, करता सहित विचार ॥ जीवधात आदिक करम, करै न कबहूं भूल । सोइ रक्षा जीवन करे, प्रेम सहित अनुकूल ॥ वाणी अप्रिय कहै नहीं, कहै सबन उपकार । ठहरे पद बोधित गुरु, लावे भक्ति गोहार ॥ चारि खान बहु जीयरहि, दुखदाई जो होय । जुरे तो रक्षे जीव कहैं, अस कह रहे चुप सोय ॥ गुरु साधुहिं सन्मानई, मिथ्या जालहिं त्याग । सांच हृदय दाया सहित, निज सुख गुरु अनुराग ॥ दीन दयालको मत लखे, शिष्य स्वतः पद थीर । साधु गुरु सम जानिके, सबहि मन बच थीर ॥ साधुनकी जल अन्नते, वस्त्र सहित करै रच्छ । शक्य यथार्थ अनुक्रम, गुरुसेवी शिष्य स्वच्छ ॥ गुरु साधुपद दीर्घजग, है शिष्य सबन प्रमान । त्रिबिधि ताहि सेवन करे, आपु दास पद मान ॥ हे शिष्य जे दासातने, हंताते तेहि भीन । तेई गुरु पारख लखे, हंत कल्पना कीन ॥ तेई उत्तम पारखी, गुरुमतके अधिकार । हंता नाशे शिष्य जो, हंस थीर पदसार ॥ दास भाव सेवा सहित, भक्ति साधु गुरुकेर । यहि प्रकार हंसा वसे, सेवकको नहीं फेर ॥

निर्णय जो गुरुमुखही सूना । ताहि मनन साक्षातहु गूना ॥ प्रेम लगावे अस्ति पद माही । ठहरे गुरु पंचाइत पाही ॥

इति

( १८६ )

बोधसागर

अथ वैराग धर्म वर्णन

दोहा—दयापाल सब जीवके, बोले सत्य विचार । मन कर्म बानी त्यागकर, मैथुन अष्टप्रकार ॥ काठंचित्रकी नाव जो, ताहुं दिशि मत देख । देखतही तन विष चढ़ै, सर्प दंशकर लेख ॥ मनमंतंग मानै नहीं, महा महाउत ज्ञान । ताते अंकुश दीजिये, हो कलिमलकी हान ॥ सुवर्ण मिट्टी एकसम, दत्त अदत्त न लेत । कार्य्य मात्र कछु लीजिये, भोजन छाजन हेत ॥ सकल परिग्रह त्यागिये, सूक्ष्म तनके काज । धर्म वस्तु जो राखिये, तौ ना होय अकाज ॥ भय नहिं देत न करतभय, निर्भय हृद मनजास । सर्प सिंह आदिक लखे, रंचहु डरे नहिं तास ॥ काला सर्प शरीरमें, सब जग डारयो खाय । साधु अंग ना मोड़ई, ज्यों भावै त्यों खाय ॥ सम्मुख आवत बाण लखि, कबहुँ न मोड़त अंग । ठौर न तजि थिरताभजे, होय प्राण जौ भंग ॥ पर्वतसे टूटी शिला, शिरपर आवत देख । सरकत नहिं निज ठौरते, प्राणघात निज लेख ॥ भूमि सन कै काठ पर, जीव घात ना होय । लोट पोट कीजे सही, ना पड़ि रहिये सोय ॥ योग ध्यानमें हृद सदा, शुद्ध हृदय निर्गन्थ । आठ पहर जपमें रहे, पाव परम पद पन्थ ॥ धर्म पुराण विचार नित, गुरुको बचन प्रमान । शांति सरल अक्रोध चित, इन्द्री दम शम जान ॥

धर्मबोध

( १८७ )

तजि चंचलता भावको, अनहिंसा रह नित । दृढ समाधिआसनअचल, छितसौ क्षमाहै चित्त ॥ घेरे विपत्ति अनेक जो, आसन तजे न संत । दुःख द्रन्द लखि भाग मति, दृढ संकल्प गहंत ॥ शुद्ध अचार विचार मय, नहिं मनमें मदमान । धीरज धर्म संतोष गहि, लघु भोजन परमान ॥ राग द्वेष नहिं शत्रु हित, तजे दर्प हंकार । शीतउष्ण समदुःख सुख, प्रिय अप्रिय यकसार ॥ मान और अपमान सम, तजे जक्त की आस । चाह रहित संशय रहित, हर्ष शोक नहिं तास ॥ अधो दृष्टि मारग चले, चार हाथ महि देख । जाग्रत मौन मधुर बचन, मन संकल्प न लेख ॥ पात्र कुपात्र विचार गृह, भिक्षा दान जो लेत । नीच अकर्म सूम घर, दान महा दुख देख ॥ सदा होय मलपात जिहि, देहि में जो नौ द्वार । मुखी ठौर एकन्त लखि, ताको दीजै डार ॥ देह को विग्रह नाम है, रोग दुःख बहु घेर । धीरज धरे मनमें सदा, दुख करि काहु न टेर ॥ अपने मन कोई करे, भावे करे न सेव । काहूसे नहिं जांच कछु, यही संतको टेव ॥ लाभालाभ जयाजयौ, गंध कुगंध समान । रूप कुरूपहिं समलखे, गुरु हरिको गुनगान ॥ संध्या तीनों काल दृढ़, कर्म किया विधिलेख । दम्भ छिद्र छल रचे नहिं, प्रभु अनन्य जो देख ॥

१ छितसौ - पूर्वोके समान क्षमापान ।