भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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धर्मबोध

( १८३ )

मौन अठारह सो कहा, वृथा बोल न गवाय ॥ ऊनविंश इस देहसे, आतम न्यारा जान । विसवें जो अन्नदि कछु, बांटिके भोजन पान ॥ ब्रह्म इकिसवें सर्वमय, नरमें निरख विशेष । वाइसवें पुनि श्रवण कह, तेइस कीर्तन लेख ॥ स्मृति चौविंश पच्चीसवें, पूजा सेवन छबीश । बन्दन दास्य अठाइसे, सरुय स्वार्पणा तीस ॥

इति ३० लक्षण

केते जनकादिक गृही, जो निज धर्मप्रवीन । पायो शुभगति आपहू, औरनहू गति दीन ॥ हरिके हेतु न देत धन, देत कुमारगमाहिं । ऐसे अन्यायी अधम, बांधे यमपुर जाहिं ॥ जो दीने सो पाइहै, लुनै जो बोया बीज । जो नहिं बोया बीज है, पावै नहिं कछु चीज ॥ गाडा धन छाडा वृथा, जो दीना सो मोर । क्रूर विचार करे नहीं, लगे न हरिकी ओर ॥ निज धनके भागी जिते, सगे बन्धु परिवार । जैसा जाको भाग है, दीजै धर्म सँभार ॥ अपने भागको लीजिये, है हराम पर हक्क । सूकर गायकी सौंहपर, अहक्क ओर जनि तक्क ॥ गह्यो सुदामा भाग हरि, भयो महा कंगाल । और भाग विषसों तजो, धर्मनीति निजुपाल ॥ तन मन धन हरि हेत दे, चेत भक्ति कर प्रीति । यहि संसार असार लखि, चल जनकी विपरीति ॥

१ सुमिरन । २ आत्मसमर्पण ।