भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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( १८४ )

बोधसागर

धन मन तन सब जायगो, रहे न जो कछु दीस । मूरख वृथा गवाँव सो, भक्ति भजे जगदीश ॥ महातिमिर घेरे हृदय, विषयभोग लपटान । सुमति न आई अजौं उर मरनकाल नियरान ॥ खाट परे तब झरखई, नयनन आवे नीर । तब कछु यतन बनै नहीं, तनु व्यापे मृतु पीर ॥ देखे जब यमदूतको, ठाढ भे सन्मुख आय । महाभयंकर भेष लखि, इत उत जीव लुकाय ॥ सकल शिथिल इन्द्री भई, रहा न कोई ओट । अब कहैं भागिकै जाइहौ, यमगण पकरी झोंट ॥ पुण्य भजन कीना नहीं, नहि संतनसे हेत । बार बार पछतात मन, चिड़िया चुन गई खेत ॥

इति गृहीधर्मका वर्णन समाप्त

अन्य गृहीधर्म वर्णन

( कबीर संग्रह )

दोहा—जो मानुष गृहधर्म युत, राखे शील विचार । गुरुमुख वाणी साधु सँग, मन वच सेवा सार ॥ सेवक भाव सदा रहे, अहम न आने चित्त । निर्णय लखे यथार्थ विधि, साधुनको कर मित्त ॥ सत्य शील दाय़ा सहित, बरते जगव्यवहार । गुरु साधुके आश्रित, दीन बचन उच्चार ॥ बहु संग्रह विरुष्यानके, चित्त न आवे ताहि । मधुकर इव सब जगतमें, घटि बढ़ि लखि बर्ताहि ॥ प्रीति सदा गुरु पारख करई । संगति साधु सदा आचरई । उत्तम मध्यम जग व्यवहारा । निर्णयसहित करे अनुसारा ॥