कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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बोधसागर
अथ मूर्खलक्षण
जिसके उदरसे जन्म लिया ऐसी माताके साथ विरोध करे, और स्त्रीको प्यार करे, सर्व परिवारोंको छोड़ दे, केवल स्त्रीके वश होकर रहे, अपने अन्तर गुप्त बातको उससे कहे उसे मूर्ख जानना । परस्त्रीके साथ प्रेम करे, श्वसुरके घरमें वास करे, नीचकी कन्यासे विवाह करे वह मूर्ख है ।
बलवानके साथ गर्व करे, मनमें ममता रखे, बल बिना सत्ता दिखावे, आत्मस्तुति करे, देशमें रहके दुःख भोगे और बाप दादेकी बड़ाई हाँके उसे मूर्ख कहते हैं । बिना कारणके हँसे, अत्यन्त अविवेकी ( अर्थात् अवसर बिना बोले हँसे ) और बहुतांका शत्रु हो उसे मूर्ख जानो ।
अपने सम्बन्धियों और परिवारके रहते हुए उनकी उपेक्षाकर परायोंसे मित्रता करे, रात दिन पराया छिद्र हूँदता रहे वह मूर्ख है ।
जहाँ बहुतलोग बैठे हों उनके बीचमें जाकर सोना और परदेशमें जाकर बहुत खाना-ऐसा मूर्ख बिना दूसरा कौन कर सकता है ।
मान अपमानकी जिसे समझ न हो, जिसका मन सदा व्यसनके वशमें पड़ा हो उसे मूर्ख जानना ।
परायेकी आशासेपरिश्रम करना छोड़कर जो निरुद्यम होकर आनन्द माने वह मूर्ख है ।
मूर्ख घरमें बड़े विवेकी बनते हैं, बहुत बोलकर अपने परिवार और स्त्रियोंमें बकता बनते हैं परन्तु सभामें शम्माति हैं, भयभीत होकर मुखसे बोल नहीं निकाल सकते ।