भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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धर्मबोध

( ११७ )

बुद्धोंके निकट ज्ञानीपना प्रकट करे, सात्त्विक और सरल हृदयके जीवोंसे छल करे, अपनेसे श्रेष्ठके साथ स्नेह करने जावे, और किसीका उपदेश माने नहीं उसे मूर्ख मानना ।

एकदम विषयी और निर्लज्ज होकर मर्यादासे बाहर कार्य करता फिरे, रोगी होने पर भी औषध न ग्रहण करे, पथ्य सेवन न करे, जो कुछ सन्मुख आवे उसे त्याग करे नहीं उसे मूर्ख जानो ।

अकेले परदेश जावे, परिचय बिना साथ करे और एकदम जाने बूझे बिना किसी बडे नगर ( शहर ) में जावे यह लक्षण मूर्खमें ही होते हैं ।

जहाँ अपमान होता हो वहाँ बारम्बार जावे, जिसको मान अपमानका कुछ विचार नहीं वह मूर्ख है ।

अपने नौकरके धनी होजानेपर उसकी सेवामें रहे और जहाँ मन लगे नहीं वहाँ रहे वह मूर्ख है ।

मूर्ख बिना विचारे तनिक अपराधपर भी दंड देते हैं, सहज सहज बातोंमें कृपणता दिखलाते हैं ।

देव पितृको नहीं मानता, शक्ति बिना बड़ी बड़ी बातें करना और सदा मूर्खसे अपशब्द बोलना मूर्खका काम है ।

घरमें अपनी बड़ी बहादुरी प्रकट करे और बाहर गरीब बन फिरे उसे मूर्ख जानना ।

नीचकी मित्रता, परस्त्रीके साथ एकान्तमें संभाषण और मार्ग चलते खाना मूर्ख लक्षण है ।

किये उपकारको माने नहीं, उपकारको भी अपकार माने, अपना थोडा किया बहुत बतावे ऐसे कृतघ्नको बुद्धिमान् मूर्ख कहते हैं ।