कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंधर्मबोध
( २०१ )
अपने स्वार्थ तक नम्रता दिखलावे, स्वार्थ निकले पीछे बेपरवाह होजावे और उपकार करनेवाला कार्य न करे वह मूर्ख है ।
जो अक्षर छोड़कर पढ़े, पुस्तककी ओर दृष्टि न रखे और अपनेको बहुत बुद्धिमान् प्रकट करे वह मूर्ख है ।
स्वयम् कभी पुस्तक पाठ करे नहीं, दूसरोंको पाठ करने दे नहीं और पुस्तकोंको बांधकर रखे वह महामूर्ख है ।
इस प्रकारसे संक्षेपमें मूर्खोंका लक्षण वर्णन किया, अपनी हितकी कामना करनेवाला पुरुष इनका विचार कर सदा ही इन दुर्गुणोंसे बचनेका प्रयत्न करे, जिससे मूर्खोंकी पंक्तिसे निकलकर उत्तमोंकी गिनतीमें आवे ।
अथ पठित मूर्खका लक्षण वर्णन
पीछे मूर्खका लक्षण वर्णन कर आये, अब उनका लक्षण वर्णन कहूँगा कि, जो बुद्धिमान् और पढ़-लिखकर भी मूर्ख हैं । अर्थात् विद्वान् होनेपर भी जिनमें मूर्खता होती है उन्हें पठितमूर्ख, कहते हैं ।
बहुत शास्त्र और ग्रन्थोंका पठन पाठन और श्रवण किया हो, ब्रह्मज्ञानकी वार्ता करे, परन्तु झूठी आशा और मिथ्या अभिमानका त्याग न करे ऐसे विद्वान्को तोतेके ज्ञानसमान अज्ञानी मूर्ख जानना ।
मुक्त पुरुषोंके चरित्रको बारम्बार मुखसे कहता है परन्तु उनके सदाचारका अनुकरण करता नहीं और स्वधर्मके साधनोंको तुच्छ दृष्टिसे देखता है तथा औरोंको उनके आचरणसे हटाता हो उसे पढ़ा हुआ मूर्ख समझना ।