भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1578

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बोधसागर

अपने ज्ञातापनके अभिमानसे सर्वमें दोष लगाता है, प्राणी मात्रमें छिद्रान्वेषण किया करता है, उसके शिष्य अथवा अधीनस्थ मनुष्य उसकी आज्ञासे बाहर चलनेवाले हों, जिसके बोलनेसे दूसरोंका दिल दुखाता हो, ऐसे पंडितको पठितमूर्ख समझो ।

सम्पूर्ण पुस्तक बांचे बिना ग्रन्थको तथा ग्रन्थकारको दूषण देना, ग्रन्थके गुणको भी अवगुण ही समझना, थोडे अवगुणको देखकर संपूर्ण अवगुण किसीमें कल्पना करलेना पठितमूर्खोंके अतिरिक्त दूसरे किससे हो सकता है ?

सदाचार और सल्लक्षणोंसे हास्य मानकर, सदाचारी और सल्लक्षण युक्त पुरुषोंकी निन्दा करता है, सदा उनको नीचा-दिसानेकी चिन्तामें लगा रहता है, वह जो कुछ नीति अथवा न्याय अपने दोषोंको छिपानेके लिये करता है सब छल छिद्रसे भरे होते हैं ।

मैं ज्ञानी हूँ, सर्वज्ञाता हूँ ऐसा मिथ्याभिमान रखकर प्रत्येक कार्योंमें हाथ डाल देता है परन्तु कार्य्य सिद्ध न होनेपर मिथ्या क्रोधके वश हो जाता है । लोगोंके अधिकारका विचार किये बिना उनसे बोलनेका साहस करता है और बचन जो बोलता है वह भी कठोर ।

बहुश्रुतपनके कारण वक्ताका सभामें अपमान करता है और मिथ्या बकवाद करता है ।

जिस बातके लिये दूसरोंको दूषित कहता वही बात अपनेमें होते हुए भी उसे जान नहीं सकता ।

अभ्यास द्वारा सर्व विद्या प्राप्त कर लेता है परन्तु उसके द्वारा जगतका कुछ उपकार नहीं कर सकता, किसीका उससे माधान नहीं होता ।