कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1599, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ेंकमालबोध
(११)
जबहीं छाती चीरन लागे । शाही महलमें आग तब जागे॥ पड़े अहमद जो बहुत ठहेली । शाहकी देह अग्नि तब भेली ॥ शाह कहे चलु जिन्दा पास । जिन्दा चले तब काशी वासा॥ जिन्दा गया काशी अस्थान । सुनी शाह मनही पछताना ॥ दरियाखान कई संग लिवाई । चला शाह काशी कई जाई ॥ हस्ती घोड़ा लिये मँगाई । जर जौहर बहु माल भराई ॥ खेचर ऊंट हाथी बहु लीना । गिनत बरे नहि आवे मीना ॥ चले अहमद आप सुलताना । दुनिया संग उठि चली निदाना॥ एक मास दिन सत्ताइस जाई । अहमद पहुँचे काशी माई ॥ कमाल पहल गुरु पहुँ आये । सतगुरु सन्मुख माथ नवाये ॥ आये अहमद सतगुरु पास । बारम्बार खैचे ऊँच उसासा ॥ जर जवाहिर माल उतारा । ले सतगुरुके चरणों धारा ॥ बहुत कहू कछु बरनी न जाई । हमही पूठ नहि दीन गुसाई ॥ साहब कमाल गुसा करि आये । हमरे तनकूँ अगिन लगाये ॥ यह सुनि सतगुरु बहुत रिसाये । तब कमालको वचन सुनाये ॥ हमको मिले सो जीव उबारें । तुम तो लाये द्रव्य भंडारें ॥
दोहा—नाम रतन धन बेचिके, लाया माल हमाल ।
बूड़ा वंश कबीरका, उपजा पूत कमाल ॥
कोड़ीसे हीरा भया, हीरेसे भया लाल ।
आधे साहब कबीर हैं, पूरा भक्त कमाल ॥
चौपाई
इतना कही दया प्रभु कीना । शाहको दुख छुड़ाये लीना ॥
साहब नजर करी भर पूरी । शाहकी जलन भई तब दूरी ॥
दरियाखान वचन
दरियाखान कहे कर जोरी । सुनु समरथ विन्ती मोरी ॥