कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
कमालबोध
(११)
जबहीं छाती चीरन लागे । शाही महलमें आग तब जागे॥ पड़े अहमद जो बहुत ठहेली । शाहकी देह अग्नि तब भेली ॥ शाह कहे चलु जिन्दा पास । जिन्दा चले तब काशी वासा॥ जिन्दा गया काशी अस्थान । सुनी शाह मनही पछताना ॥ दरियाखान कई संग लिवाई । चला शाह काशी कई जाई ॥ हस्ती घोड़ा लिये मँगाई । जर जौहर बहु माल भराई ॥ खेचर ऊंट हाथी बहु लीना । गिनत बरे नहि आवे मीना ॥ चले अहमद आप सुलताना । दुनिया संग उठि चली निदाना॥ एक मास दिन सत्ताइस जाई । अहमद पहुँचे काशी माई ॥ कमाल पहल गुरु पहुँ आये । सतगुरु सन्मुख माथ नवाये ॥ आये अहमद सतगुरु पास । बारम्बार खैचे ऊँच उसासा ॥ जर जवाहिर माल उतारा । ले सतगुरुके चरणों धारा ॥ बहुत कहू कछु बरनी न जाई । हमही पूठ नहि दीन गुसाई ॥ साहब कमाल गुसा करि आये । हमरे तनकूँ अगिन लगाये ॥ यह सुनि सतगुरु बहुत रिसाये । तब कमालको वचन सुनाये ॥ हमको मिले सो जीव उबारें । तुम तो लाये द्रव्य भंडारें ॥
दोहा—नाम रतन धन बेचिके, लाया माल हमाल ।
बूड़ा वंश कबीरका, उपजा पूत कमाल ॥
कोड़ीसे हीरा भया, हीरेसे भया लाल ।
आधे साहब कबीर हैं, पूरा भक्त कमाल ॥
चौपाई
इतना कही दया प्रभु कीना । शाहको दुख छुड़ाये लीना ॥
साहब नजर करी भर पूरी । शाहकी जलन भई तब दूरी ॥
दरियाखान वचन
दरियाखान कहे कर जोरी । सुनु समरथ विन्ती मोरी ॥
( १२ )
बोधसागर
हम तो फूलका पखुरी डारा । कौन चूक है गुरु हमारा ॥ पहिले इलम फकीरी दीना । फिरके जनम भूतको कीना ॥ कौन चूक अपराध गुसाई । सो समरथ मोहि देहु बताई ॥ थोड़ा चूक बहुत दुख दीना । हो समरथ मैं होऊं अधीना ॥ भूत जनम बड़ होय मलीना । महा दुख तुम सदा जो दीना ॥ ऐसी चूक है कहा हमारी । भूत खानिका दुख बड़ भारी ॥
सतगुरु वचन
सुनो दरिया यक बात हमारी । पहली बोधहिमें भयी खुवारी ॥ बिना कसनी इलम तोहि दीन्हा । बिनाकसनीतुमगुरुनहिँ चीन्हा ॥ निरखि परखिकेजिनसिर दीना । सो कबहुँ ना होय मलीना ॥ पहले जगमें जीव चितायी । समझि सीख पुनि दीजे ताही ॥ इलम दिया जब रहा न कोई । पीर सुरीदके वेष होय जोई ॥ कलियुग जीव कालके सारा । सीखे चतुराई करै अपारा ॥ इलम लेनकुं झगरा ठाने । कसनी सुनी कोध मन आने ॥
कसनी परीक्षा
पहिले कसनी कसहिँ अपारा । तन मन धन यह तीन विचारा ॥ यह तीनों है त्रैगुण सारी । यह तीनों मिलि भक्ति उजारी ॥ यह तीनों मिलि गुरुकेबस होई । करहु सुरीद इलम देहु सोई ॥ दोहा—यह तीनों अरपे नहीं, कोटिक कहे बनाय । कहै कबीर सत मानहु, तेहि जिव गोता खाय ॥
चौपाई
यह तीनों तुम दीना नहीं । इलम फकीरी सहज तुम पाई ॥ तुमको कसनी नहीं लगारा । तुम दोजखकानर गुरुको मारा ॥ अपना कौल तुम गये हिरायी । ताते जनम भूतको पायी ॥
कमालबोध
( १३ )
तुम ता औगुन बहुते कीन्हा । दोऊनजर तुमगुरुनहिं चीन्हा ॥ अब तो हमसो कछु न होई । गुरुका शब्द हुआ होय सोई ॥ इसमें दोष गुरुका नाई । तुम्हरी दुर्मति भूत गति पाई ॥ दोहा-तुम जानो हम भूलिया, दिलमें रहे डुलास । कलयुग जीव बहु भूलसी, सो रहे तुमरे पास ॥
चौपाई
बहुतक शिष्य होयंगे भाई । सो सतगुरुसो कौल बँधाई ॥ तन मन धन चरणों धरिहैं । ऐसी लंबारी मुख सो करिहैं ॥ ऐसी कहि वह शब्द सो लईहै । शब्द लेह पुनि एक न दइहै ॥ साचा कौल हजुरी कीना । कौल चूक सो तुमको दीना ॥ ऐसा कलिका कठिन तमाशा । बहुत रहेंगे तुमरे पास ॥ जो कोइ होइ हैं कौल मलीना । ताको जनम भूतको दीना ॥
दोहा-सब दोजरव फिरि आईहैं, तब तुम करो सम्हार ।
इल्म फकीरी साधिके, उतरो भवजल पार ॥
चौपाई
अहमद शाह चले शिरनायी । धनिसतगुरु मैं तुव बलि जाई॥ हमरे तनकी तपन बुझायी । दरियाखां चले पछतायी ॥ सत्य भूपकी राह चलायी । जैसा किया तैसा फल पायी ॥ शिष्य होयके दुर्मति करहीं । सो तो जनम भूतको धरहीं ॥
कमाल वचन
तबहीं कमाल कहे शिर नाई । हे समरथ करु कौन उपाई ॥ कैसे चलिहहिं पंथ हमारा । कैसे होइहहिं जीव उबारा ॥ कैसे आवागमन मिटाऊ । सो साहब मोहि भाषि सुनाऊ ॥ कैसे उतरूँ भवजल पारा । सतगुरु मेरा करहु उबारा ॥
( १४ )
बोधसागर
सत गुरु वचन
सुनहु कमाल कहूँ चित्त लाई । तुमरे पंथमें सुक्ती नाई ॥ प्रथम शिष्य दरियाको कीना । ताको जन्म भूतको दीना ॥ पहले इल्म फकीरी दीना । फिरके जन्म भूतको कीना ॥ उनही जन्म भूतको पायी । शब्द पाय पुनि गये गवाई ॥ पंथ न चले ऐसे सुनि लेहू । प्रथम बोध विचली पुनि गेहू ॥
दोहा-पंथ न चले कमालजी, कोटिक करो उपाय ।
घोखे जीव बिगोय हो, धर्मराय धरिखाय ॥
कमाल वचन
हाथ जोरिके शीश नवायी । समरथ मोहि कहो समझायी ॥ पंथ न चले कौन विधि करिये । कहोतो अलोप पांव हम धरिये ॥ मैं हूँ जेठा शिष्य गुसाई । पंथ ना चलइ भौजल भाई ॥ विना पंथ मोहि कौन पिछाने । कमाल कबीर सबै जग जाने ॥
सतगुरु वचन
सतगुरु कहै कमाल सुने बानी । पंथ चलनकी सुधि पहिचानी ॥ कमाल नाम ले पंथ चलाऊ । कही ज्ञान घर घर समझाऊ ॥ इल्म फकीरी राखो हम पास । और सखी पद करो परकाशा ॥ यही शब्द करो गुरु आई । बिंद साधना रहे सब ताई ॥ रहनि गहनि तुम देह बुझाई । सो जिव धर्म सुन्नमें जाई ॥ चारों युगमें अटल मम दासा । तुम साखी पद करो प्रकाशा ॥ यह राह मेटि भाषो अधिकारा । निश्चय परिहो नर्क मंझारा ॥
साखी-परमारथ तुम साजहू, करहू शब्द विचार ।
भौसागरमें भय नहीं, सोडह नाम अधार ॥
कमाल-वचन चौपाई
समरथ गुरु ऐसी सुनि लेहू । इल्म फकीरी किसकूँ देहूँ ॥
कमालबोध
( १५ )
कौन ठौर घर रहे निदाना । सो समरथ मोहि कहो परमाना ॥ सो मैं कहूँ शिष्यनले आगे । सुरत शब्द चरण चित लागे ॥ एती आगम कहो सुधारो । चरण टेंकि प्रभु करें निहारो ॥
सतगुरु वचन
सुनो कमालनिज कहाँ विचारा । जब सतगुरुमुखते शब्द उचारा ॥ कलियुग आया कहूँ प्रमाना । बांधो गढ़में होय अस्थाना ॥ सुकृत अंश प्रकटे संसारा । अंश लोकते आये हमारा ॥ सो धर्मदास घर लेई औतारा । उसका पंथ चले संसारा ॥ वंश व्यालिस अविचल राजा । सोइ जीवनका करिहैं काजा ॥ उनका वीरा शब्द जो पावै । सोइ हँसा लोक सिधावै ॥ और जीव बांचे नहीं कोई । कोटिक ज्ञान करे पुनि जोई ॥ आगम तुमको कहूँ समुझाई । कुदरत कमाल सुनो चितलाई ॥ जोई इल्म पुरुषके पास । सोई वंशमें होय प्रकाशा ॥ विना फकीरी इल्म नहीं जाने । युक्ति बिना योगी बजराने ॥ युक्ति सार कोइ हँसा पावे । लोकहिं जाय बहुरि नहीं आवे ॥ आवत जात मिलि रहे समाई । विना फकीरी इल्म कहूँ पाई ॥ सतगुरु बिना युक्ति नहीं आवे । बिना युक्ति फकीरी पछतावे ॥ पांच तीनको करहिं निरासा । सोई फकीरी इल्म जिन पास ॥ लगन तत्त्वकी युक्ती जाने । सोई योगी है युक्ति पराने ॥ नहीं तो कथनी कथहिं अपारा । बिनु परिचय बूझे संसारा ॥ दोहा—कथनी करनी चतुराई, कीना पांचों पार ।
वंश छाप गुरु युक्ती पावे, इल्म फकीरी सार ॥
कमाल वचन
चरण टेंकि हम करें निहोरा । हमरे जिव गुरु होय निवेरा ॥ भौसागरमें बड़ दुख होई । महा त्रास दुख व्यापै सोई ॥ कठिन त्रास है भवजल धारा । जाते सतगुरु करहु उबारा ॥
( १६ )
बोधसागर
सतगुरु वचन
कुदरत कमाल सुतअंश हमारा । तुमरे जिवका करो उबारा ॥ इलम फकीरी तुमको दीना । जीव उबार अपना करलीना ॥ सोई इलम मम राखू पासा । साखी पद तुम करहु प्रकाशा ॥ जो यह इलम बाहर जायी । तो हम तुम बिछुरेंगे भाई ॥ इलम यही धर्म दासको दीना । जाते हंस अमर करि लीना ॥
दोहा-बन्धे कौल कमालके, सतगुरु कहे पुकार ।
धरमदासके वंश विना, कौन उतारे पार ॥
आगे बानी भाँई भाई । दास कमाल सुनो चितलाई ॥ कलियुग भेद कहै परकाशा । हंस पहुँचाऊँ लोक निवासा ॥ विहँगम मति हंस जब होई । सत्य कही सत्यलोक समोई ॥ आगम भेद कही समुझाई । भौजल बूड़त तुरत बचाई ॥ वंश व्यालिस सौपी गुरुवाही । जो बूझे तेहि देउँ बताही ॥ सोई इलम सौपा उनपासा । सब जीवनकी पूरे आसा ॥ वंश दया जाहि पर होई । होय पुनि हंसा अम्बर सोई ॥ कह कबीर हम सतही भाखा । सुनो कमाल गोय नहिं राखा ॥
दोहा-कलमाते कल उपज्यो, सब कल कलमा माहिं ॥
सोकलमा दिया कमालको, सब कल कलमाहि समाहिं ॥
जीवत मृतक होय रहे, जाग्रत माहिं समय ।
इलम फकीरी अलम सही, आवे जाये बलाय ॥
समरथ सतगुरु भेटिया, भये मद मस्तु निहाल ।
प्रेम प्याला सही किया, सुक्ता खेले कमाल ॥
इति कमालबोध
कमालबोध
( १७ )
विवेचन
★
कमालबोधकी केवल एकही प्रति सम्बत् १९११ की लिखी हुई मेरे पास है। जिस परसे यह पुस्तक छापी गयी है। पाठक! एकबार आप अनुरागसागर आदिग्रन्थोंमें लिखे बारह पंथका हाल स्मरण कीजिये फिर इस ग्रन्थोंके आशयसे मिलाइये। अब आप स्वयम् विचार कीजिये आप किस ग्रन्थको सत्य और किसको असत्य मानते हैं। और ग्रन्थोंमें कमाल साहबको साक्षात् कालदूत लिखा है। इस ग्रन्थमें कबीर साहेब खास वही भेद जोगुरुधर्मदास साहबको बतलाया है वही मुक्ति भेद कमालको बतलाने की बात कहते हैं। भला बतलाइये तो वह सत्य की यह ? इसी प्रकार कबीरपन्थके सबग्रन्थोंमें गड़बड़ और पूर्वापर तथाविषयान्तरका भेद है इन्हींग्रन्थोंको कबीरपन्थीगुरु और महन्त लोग अपनामार्ग दर्शक मानते और घमण्ड करते हैं। यही कारण है कि आज कोई भी कबीरपंथी महंत साधू और सेवक किसी विचार पर स्थिर न होकर मारे मारे और भटकते फिरते हैं। और विषयवासनामें लुप्त हो संसारकी मर्यादा और सत्यगुरुकी आज्ञाका उल्लंघन कर न करने योग्य कर्मोंको करके कबीरपंथकी निन्दा करा रहे हैं। यही गड़बड़ देखकर अच्छे २ विचारपने सत्यगुरुके उपदेशको समझने और जाननेवाले लोग कबीरपंथी कहलानेसे ही लज्जित होकर इस पन्थको छोड़ते जाते हैं जिसके पूर्ण वृत्तान्त कबीर धर्मसारमें लिखा जायगा।
इति
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REPORT
The following report is submitted to the Board of Directors of the Company. It is a summary of the financial and operational performance of the Company during the fiscal year ended December 31, 2019. The report is prepared in accordance with International Financial Reporting Standards (IFRS) and is intended for the information of the Board of Directors and the Company's shareholders.
The Company's financial performance for the year ended December 31, 2019, was characterized by a strong growth in revenue and a significant improvement in profitability. The Company's revenue increased by 15% compared to the previous year, driven by a strong demand for its products and services. The Company's operating profit increased by 20% compared to the previous year, reflecting a strong cost control and a positive impact of the Company's strategic initiatives.
The Company's financial position as of December 31, 2019, was strong. The Company's total assets increased by 10% compared to the previous year, and the Company's total liabilities increased by 8% compared to the previous year. The Company's net assets increased by 12% compared to the previous year, reflecting a strong financial performance.
The Company's cash flow for the year ended December 31, 2019, was positive. The Company's operating activities generated a positive cash flow of 100 million yen, and the Company's investing activities generated a positive cash flow of 50 million yen. The Company's financing activities generated a negative cash flow of 30 million yen, reflecting the Company's investment in capital expenditures.
The Company's financial performance for the year ended December 31, 2019, was driven by a strong demand for its products and services, a strong cost control, and a positive impact of the Company's strategic initiatives. The Company's financial position as of December 31, 2019, was strong, and the Company's cash flow for the year ended December 31, 2019, was positive.
Yours faithfully,
Chief Executive Officer
श्रीबोधसागरे-
श्वासगुंजार
भारतपथिक कबीरपंथी
स्वामी श्रीयुगलानन्दद्वारा संगृहीत
मुद्रक व प्रकाशक-
गंगाविष्णु श्रीकृष्णदास,
अध्यक्ष-“लक्ष्मी वेङ्कटेश्वर” स्टीम-प्रेस,
कल्याण-बम्बई.
पुनर्मुद्रणादि सर्वाधिकार ‘श्रीवेंकटेश्वर’ मुद्रणयन्त्रालयाध्यक्षाधीन है
नं. १० बोधसागर - ३
पुस्तक संख्या
पुस्तक संख्या
पुस्तक संख्या
पुस्तक संख्या
पुस्तक संख्या
सत्यनाम
श्री कबीर साहिब
1111 1111 1111
सत्यसुक्त, आदि अदली, अजर, अचिन्त पुरुष, मुनीन्द्र, करुणामय, कबीर, सुरति योग, संतायन, धनी धर्मदास, चूरामणिनाम, सुदर्शन नाम, कुलपति नाम, प्रबोध गुरुबालापीर, केवल नाम, अमोल नाम, सुरतिसनेही नाम, हक्क नाम, पाकनाम, प्रकट नाम, धीरज नाम, उग्रनाम, दया नाम की वंश व्यालीसकी दया
★
अथ श्रीबोधसागरे
श्वसगुआर प्रारम्भः
★
द्वारविशस्तरंगः
चौपाई
कहै कबीर सत्य प्रकाशा । श्रोता सुरति धनी धर्मदासा ॥ सत्य सार सुक्त गुण गायो । अविचल बाह अछै पद पायो ॥ संशय रहित सदा सो गाऊँ । शीलरूप सब हिमकर नाऊँ ॥ करै कुलाहल हंस उजागर । मोह रहित सब मुखके सागर ॥
( २ )
बोधसागर
तेहि पुर जरा मरण भ्रम नाहीं । मन विकार इंद्दी नहिं ताहीं ॥ सत्य लोक हंसन सुख होई । सो सुख यहाँ न जाने कोई ॥ जाने सो जो उहाँ रहाई । ईहाँ आय कहे समुझाई ॥ आवत जात बार नहिं लावे । उहाँकी चाल सोई यहाँ लावे ॥ जो समझे सोइ उतरे पारा । बिन समझे सब यमके चारा ॥
समय-अमरलोककी महिमा, सत्य शब्द उपदेश ।
हंस हेतु सो वरनो, छूटे यमकर देश ॥
चौपाई
अमरलोककी अविगति बानी । धरमदास मैं कहूँ बखानी ॥ जो समझे सो उतरे पारा । बिन समझे सब यमके चारा ॥ प्रथम शरण सतगुरु गुण गाऊं । अक्षरभेद सकल सुधि पाऊं ॥ सत्यलोक कर भाव अपारा । सो भवसागर करै पसारा ॥ भाषों अग्र अग्रकी बानी । भाषों द्वीप जहाँ लगि खानी ॥ भाषों पुरुष पुरुषकी काया । भाषों अमी अमान अमाया ॥ भाषों पुरुष लोककी बानी । भाषों सबै सहज सहिदानी ॥ जो काया प्रभु आप सँवारा । सो समुझाइ कहो व्यवहारा ॥ अमर तार अखण्डित बानी । श्वासा पार सार सहिदानी ॥ जबही क्या प्रभु आप सुधारा । कहौं विचारि तासु व्यवहारा ॥ जेतिक श्वासा पुरुषकी देहा । तार तार कर कहों सनेहा ॥ जेतिक वचन पुरुष उच्चार । तेह तेह वचन नाम अधिकारा ॥ श्वास पारस आदि निरबाना । सोरह सुतकी नाल बखाना ॥
समय-पांच अमीकी देह धरि, प्रकटी ज्योति अपार ।
सुरति संग निहतत्त्व पुर, पुरुष होत श्वास गुंजार ॥
धर्मदास वचन-चौपाई
हाथ जोरिके टेकेउ पाऊ । साहब कहौ तहँवाके भाऊ ॥
श्वसगुआर
( ३ )
कहौ लोक कर प्रकट विचारा । जहाँलौ दीपहिं कर विस्तारा ॥ बरनौ द्वीप गुप्त अनुसारा । बरनौ जहाँ लगिसकल पसारा ॥ बरनौ सोरह सुतकर भाऊ । तीन शक्ति कैसे निरमाऊ ॥ पुरुष श्वास जेता अनुसारा । ताकर कहां सकल विस्तारा ॥ केहि विधि सोरह सुत प्रकाशा । केहि केहि कहाँ रही वासा ॥ कहाँ विस्तारि सकल अस्थाना । सत्यलोक और यमके थाना ॥ कैसे आदि अन्त प्रभु कीन्हा । कैसे रचा देहकर चीन्हा ॥ कैसे भये निरंजन राया । कैसे तीन लोक निरमाया ॥ कैसे उपजन विनशन कीन्हा । काह जानि बाजीयम दीन्हा ॥ कैसे इन्द्री देह बनाई । कैसे जीव परा वसि आई ॥ कैसे जीव अपनपौ दरसे । कैसे जीव पुरुष पग परसे ॥
समय-काया मध्ये श्वास है, श्वासा मध्ये सार ।
सार शब्द विचारिके, साहब कहो सुधार ॥
सतगुरु वचन चौपाई
धर्मदास जो पूछेउ आई । आदि अन्त सब कहां बुझाई ॥ कहां लोक लोककी बानी । कहां पुरुष सुतकी उत्पानी ॥ कहां संदेश दया करि तोही । सुक्ति जान जो पूछेउ मोही ॥ सुनहुँ सन्देश आदि निरबाना । जाके सुनत काल छे माना ॥ सुमिरहु आदिपुरुष दरबारा । सुमिरत आप हंस होय पारा ॥
समय-तीनलोकके भीतरे, रोकि रह्यो यमद्वार ।
वेद शास्त्र अगुवा कियो, मोह्यो सब संसार ॥
चौपाई
धर्मदास चित चेतहु जानी । कहां बुझाय अगरकी बानी ॥ पुरुष अजावन रहा जो देहा । तत्त्व बिहीन सुरति सनेहा ॥
१-कहाँ बुझाइ भेद समुझाई ।
( ४ )
बोधसागर
चारि करी सिंहासन जोरी । पाँचयें अचित आप अंजोरी ॥ चारि करी चारिउ परवाना । शक्ती भीतर वह अकुलाना ॥ समय-करि करि महा परिमल, बाससुबासकी खानि । तेज करी जो प्रगट भइ, तामहँ आइ समानि ॥
चौपाई
पुरुष अचित चिन्ता जब कीन्हा । उपज्यो सुरति शब्दको चीन्हा ॥ रहे गुप्त प्रकट भई काया । श्वासा सार शब्द निरमाया ॥ शब्दहिते है पुरुष अस्थूला । शब्दहि मय है सबको मूला ॥ शब्दहिते बहु शब्द उचारा । शब्द शब्द भया उजियारा ॥ शब्दहिते भव सकल पसारा । सोइ शब्द जिवके रखवारा ॥ प्रथमशब्द भया अनुसार । नीहतत्त्व एक कमल सुधारा ॥ नीहतत्त्वपर आसन कीन्हा । रचना रची सकल तब लीन्हौ ॥ रच्यौ पुहुप द्वीप मनिभारी । सहस्र अठासी द्वीप सुधारी ॥ अक्षै वृक्ष एक राशि बनाई । अग्रवास तहाँ रही समाई ॥ समय-पेड़ पात निज फूल महँ, प्रगटी बास अनूप । पारस निहतत्त्वहि पुरुष, सुरति हंसको रूप ॥
चौपाई
जब पारस सुरति भये स्थाना । अगर प्रताप निमिष उरआना ॥ पुरुष प्रसन्न नाम उच्चार । श्वासापर सब रचनि सुधारा ॥ श्वासा सार शब्द गुञ्जारा । पांच अमीको भयो विस्तारा ॥ पांच अमीको जो विस्तारा । ताहि अमी सब लोक सुधारा ॥ श्वासा पुहुप अगरकी खानी । सोरह सूनु भये उत्पानी ॥ पांच अमी साहबके अंगा । पांच तत्त्व समरत्थ प्रसन्न ॥ श्वासा स्नेह सबै उपजाया । बानी बानी वरन बनाया ॥ सत्यलोक सबही को मूला । भयऊ सत्य सो सब अस्थूला ॥
श्वासगुप्कार
( ५ )
श्वासासार सत्य कर भाऊँ । अमी आदि उपजी तेहिनाऊँ ॥
( सत्यसार श्वासा संभारी । अमी आदि पारस तहैं धारी ॥
श्वासा आदि सुरङ्ग बखाना । रंग अमीकर भा बंधाना ॥
श्वासा अजर नाम अनुमाना । प्रकटी अमी अजर सुजना ॥
अदल नाम श्वासा परकाशा । उपजी अमी अमान सुवासा ॥
खासा निरनै भ्या अनुसारा । अधर अमीका भा विस्तारा ॥
श्वासा पांच प्रकटि विस्तारा । पांच अमीकर भया पसारा ॥
पांच अमी पाँचों अधिकारा । पांचतत्व तेहि संग सुधारा ॥
पांच अमी सब लोक सुधारा । पांच तत्त्व घै गुप्तनुसारा ॥
समय-पांच अमीते पांच भए, पांच नाम अधिकार ।
सैन स्नेह उत्पन्न भई, अमी तत्त्व विस्तार ॥
चौपाई
सोरह श्वासा सार सहाया । सोरह सुतकी प्रकटी काया ॥
सोरह सुतकी सोरह नाला । एकते एक अमान रिसाला ॥
पुहुप नाम श्वासा अनुसारी । उपजे सुरति हंस पति भारी ॥
सुरति समानी प्रभुकी देहा । बाहर भीतर एक सनेहा ॥
पांच अमीकी प्रकटी देहा । सुरति कीन्ह तेहि माँहि सनेहा ॥
जेतिक पुरुष खान निर्माया । पांच अमीते सबकी काया ॥
पाँचों अमी साहबके अंगा । नाल सात उपजी तेहि सङ्गा ॥
सात नालकर एके भाऊ । सातौं रहै पुरुषके ठाऊँ ॥
पुरुष सुरति कहँअगुवा कीन्हा । सातौं नाल सौंपत तेहि दीना ॥
सातों नाल सुरति जब पाई । ताहि नेहमों रहे समाई ॥
क्षण बाहर क्षण भीतर आवै । देह विदेह दोऊ दरसावै ॥
अमरतार निःअक्षर कियेऊ । सोऊ पुरुष सुरति कह देऊ ॥
समय-अमर निरक्षर सङ्ग लिय, अर्ध ध्वजा फहराय ॥
पलटि समानिसुरति पुरुष, देहमें अक्षय छिपाय ॥
( ६ )
बोधसागर
चौपाई
( सोलह सुतकी उत्पत्ति प्रकार )
सुरति नेह प्रभु इच्छा कीन्हौ । सोरह सुत उपजावे लीन्हौ ॥ सत्यनाम श्वासा अनुमाना । सुकृत अंश भये अगुआना ॥ दूजी श्वासा बाहेर आई । उपजे सहैत शून्य तिन्ह पाई ॥ तिसरी श्वासा पुहुप सनेही । तेहिते भई हमांरी देही ॥ चौथी श्वासा तेज सनेहा । तेहिते भई धर्मकी देहा ॥ पांचह श्वासा नाम खुमारी । उपजी कन्यां आदि कुमारी ॥ शील नाम स्वासा निरमयऊ । छठयें अंश सुजनं जन भयऊ ॥ सतयें स्वासा नाम अनंगा । उपजे अंश भृगीसुंनि संगा ॥ अठयें स्वासा नाम सुहेली । उपजे कूर्म शीस उर मेली ॥ नवयें स्वासा नाम सोहंगी । नाम ते उपजे सुत संरवंगी ॥ दसयें स्वासा नाम रसीला । जाते उपजी संरवन लीला ॥ ग्यरहें श्वासा नाम सुरंगा । सुत स्वाभावें उपजे तेहि संगा ॥ ब रहें स्वासा नाम सुमाहां । भाव नाम सुत उपज ताहां ॥ तेरहें स्वासा अछय सुभाऊ । उपजे सुत विवेकें तेहि नाऊ ॥ चौदह स्वासा अमर बखाना । उपजे सुत संतोषें सुजाना ॥ पंद्रहे स्वासा प्रेम सनेहा । उपजी कदल ब्रह्मकी देहा ॥ ❁ षोडशे स्वासा नाम जलरङ्गी । उपजी दंया पालन सङ्गी ॥ षोडश स्वासा षोडश बानी । उपजे भोग संतायन ज्ञानी ॥ सोलह स्वासा नाम बखाना । उपजे सोलह सुत निरवाना ॥ सोरह सुत कर एकै मूला । भिन्न भिन्न प्रगटी अस्थूला ॥ एके पिता एक व्यवहारा । सब जो रहिहैं पुरुष दरबारा ॥
- कई एक प्रतियोंमें इस चौपाईको ऐसा लिखा है की, "सतरहें श्वासा अदत मुबानी" परन्तु षोडश, सुतकी उत्पत्ति वर्णन करते हुये सतरहवें की उत्पत्ति वर्णन असङ्गत जानकर यही शुद्ध जान पड़ा ।
भासगुञ्जार
( ७ )
एक पाँवते सेवा करहीं । पुरुष वचन शीशपर धरहीं ॥ सेवा करति रही लौलीना । पुरुषलोकते होहि ना मीना ॥
समय-सोरह सुतकी एक मूला, एकते एक अधीन । कर जोर सेवा करें, प्रेमभक्त लौलीन ॥
चौपाई
सेवा करत बहु दिन गयऊ । पुरुष अवाज अधरधुनि भयऊ ॥ अर्ध अवाज भई जब बानी । निकसी अगर बासकी खानी ॥ सबतर लोक द्वीप रहि छाई । बिमलवास भरपूरि रहाई ॥ अगर वास सब हंसन पाई । निर्मलवास सदा सुखदाई ॥ पीअत अमृत सब अघाने । आपु आपु पुर सबै सिधाने ॥ धर्मराय सेवा अधिकाने । सो सब तोहि कहौं सहिदाने ॥ छलके वचनपुरुष सो लीन्हौं । पाछे दूंद लोक महाँ कीन्हौं ॥
समय-और सबै सुत बैठे, अपने अपने स्थान ।
धरमरोष सबते कियो, ठाँम ठाँम विगरान ॥
धर्मदास वचन-चौपाई
धर्मदास बिनवैं करजोरी । साहव मेटेहु संशय मोरी ॥ और सब सुत अछप छिपाने । धर्मराय कैसे विगराने ॥ कैसे और सब सुत सब भारी । धर्मराय कैसे भये विकारी ॥
सतगुरु वचन
धर्मदास सुनहुँ चितलाई । कहौं सैंदेश आदि समझाई ॥ जब प्रकटे प्रभु अमर तारा । निकसी अघर निरक्षर धारा ॥ भई अवाज अधरसे बानी । निकसी अगर बासकी खानी ॥ पारस परिमल महक बसाई । सोई परिमल सुरति दुराई ॥
( ८ )
बोधसागर
अगर छिपाय आप महाराखा । सुरति स्नेह मुख प्रकटी भारखा ॥ प्रथम पुरुष मुख भाषा आई । भाषा अग्र पारस निरमाई ॥ भाषा बचन भया अधिकारा । भाषहिते भा सकल विस्तारा ॥ भाषा वचन पुरुष उच्चार । सो सब सत्यलोक व्यवहारा ॥ भाषा बोल पुरुष उच्चार । सेवहु सत्यलोकके द्वारा ॥ श्वासा सार तार जोरि आना । अधर अमान ध्वजा फहराना ॥ भाषा स्वर बानी अनुमाना । श्वास सार तार जुरि आना ॥ निमिष माहिं अनेक संचारा । बचन समान श्वास गुञ्जारा ॥ नाव स्नेह शब्द मैञ्जारा । (बचन समान श्वास गुञ्जारा) ॥ श्वासा नेह देह भई जबहीं । भाषा सहज बचन भा तबहीं ॥
आगेकी उत्पत्ति प्रकार
प्रथम श्वासकी निकसी खानी । उपजे सुत सुकृत सम आनी ॥ निमिषनेह प्रसन्न सुधारै । नाममूल टकसार उचारै ॥ भो विस्तार निमेश एक गयऊ । " " " " ॥ मूलगुप्त मस्तक नहिं देखा । आदि नाम अमरघर लेखा ॥ पेड़के गहे मूल धनु गाजा । सोई मूल फूल फल लागा ॥ पेड़हिं गये मूल औ शाखा । मूल मिले तबहि रचि शाखा ॥ गुप्त मूलते प्रकटी शाखा । पल्लव मूल पड़ै गहि राखा ॥ पेड़ देखि पल्लव फैलावै । पल्लव फैले अन्त नहिं पावै ॥ पल्लव चढ़े पेड़ चित राखा । मिले मूल तब फलरस चाखा ॥ आदि अन्त दुइ पेड़ समाना । आपहि राखा आप पहिचान ॥ जागि सुरति पुनि पेड़ निहारा । फलरसि चाखी बीजगहि डारा ॥ बीजाते सोई फल होई । फल रस लेह मूल तजि छाई ॥ जागि सुरति सपन मिट गयेऊ । दुई चितमेटि एकचित भयेऊ ॥