कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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बोधसागर
चौपाई
( सोलह सुतकी उत्पत्ति प्रकार )
सुरति नेह प्रभु इच्छा कीन्हौ । सोरह सुत उपजावे लीन्हौ ॥ सत्यनाम श्वासा अनुमाना । सुकृत अंश भये अगुआना ॥ दूजी श्वासा बाहेर आई । उपजे सहैत शून्य तिन्ह पाई ॥ तिसरी श्वासा पुहुप सनेही । तेहिते भई हमांरी देही ॥ चौथी श्वासा तेज सनेहा । तेहिते भई धर्मकी देहा ॥ पांचह श्वासा नाम खुमारी । उपजी कन्यां आदि कुमारी ॥ शील नाम स्वासा निरमयऊ । छठयें अंश सुजनं जन भयऊ ॥ सतयें स्वासा नाम अनंगा । उपजे अंश भृगीसुंनि संगा ॥ अठयें स्वासा नाम सुहेली । उपजे कूर्म शीस उर मेली ॥ नवयें स्वासा नाम सोहंगी । नाम ते उपजे सुत संरवंगी ॥ दसयें स्वासा नाम रसीला । जाते उपजी संरवन लीला ॥ ग्यरहें श्वासा नाम सुरंगा । सुत स्वाभावें उपजे तेहि संगा ॥ ब रहें स्वासा नाम सुमाहां । भाव नाम सुत उपज ताहां ॥ तेरहें स्वासा अछय सुभाऊ । उपजे सुत विवेकें तेहि नाऊ ॥ चौदह स्वासा अमर बखाना । उपजे सुत संतोषें सुजाना ॥ पंद्रहे स्वासा प्रेम सनेहा । उपजी कदल ब्रह्मकी देहा ॥ ❁ षोडशे स्वासा नाम जलरङ्गी । उपजी दंया पालन सङ्गी ॥ षोडश स्वासा षोडश बानी । उपजे भोग संतायन ज्ञानी ॥ सोलह स्वासा नाम बखाना । उपजे सोलह सुत निरवाना ॥ सोरह सुत कर एकै मूला । भिन्न भिन्न प्रगटी अस्थूला ॥ एके पिता एक व्यवहारा । सब जो रहिहैं पुरुष दरबारा ॥
- कई एक प्रतियोंमें इस चौपाईको ऐसा लिखा है की, "सतरहें श्वासा अदत मुबानी" परन्तु षोडश, सुतकी उत्पत्ति वर्णन करते हुये सतरहवें की उत्पत्ति वर्णन असङ्गत जानकर यही शुद्ध जान पड़ा ।