भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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श्वासगुप्कार

( ५ )

श्वासासार सत्य कर भाऊँ । अमी आदि उपजी तेहिनाऊँ ॥

( सत्यसार श्वासा संभारी । अमी आदि पारस तहैं धारी ॥

श्वासा आदि सुरङ्ग बखाना । रंग अमीकर भा बंधाना ॥

श्वासा अजर नाम अनुमाना । प्रकटी अमी अजर सुजना ॥

अदल नाम श्वासा परकाशा । उपजी अमी अमान सुवासा ॥

खासा निरनै भ्या अनुसारा । अधर अमीका भा विस्तारा ॥

श्वासा पांच प्रकटि विस्तारा । पांच अमीकर भया पसारा ॥

पांच अमी पाँचों अधिकारा । पांचतत्व तेहि संग सुधारा ॥

पांच अमी सब लोक सुधारा । पांच तत्त्व घै गुप्तनुसारा ॥

समय-पांच अमीते पांच भए, पांच नाम अधिकार ।

सैन स्नेह उत्पन्न भई, अमी तत्त्व विस्तार ॥

चौपाई

सोरह श्वासा सार सहाया । सोरह सुतकी प्रकटी काया ॥

सोरह सुतकी सोरह नाला । एकते एक अमान रिसाला ॥

पुहुप नाम श्वासा अनुसारी । उपजे सुरति हंस पति भारी ॥

सुरति समानी प्रभुकी देहा । बाहर भीतर एक सनेहा ॥

पांच अमीकी प्रकटी देहा । सुरति कीन्ह तेहि माँहि सनेहा ॥

जेतिक पुरुष खान निर्माया । पांच अमीते सबकी काया ॥

पाँचों अमी साहबके अंगा । नाल सात उपजी तेहि सङ्गा ॥

सात नालकर एके भाऊ । सातौं रहै पुरुषके ठाऊँ ॥

पुरुष सुरति कहँअगुवा कीन्हा । सातौं नाल सौंपत तेहि दीना ॥

सातों नाल सुरति जब पाई । ताहि नेहमों रहे समाई ॥

क्षण बाहर क्षण भीतर आवै । देह विदेह दोऊ दरसावै ॥

अमरतार निःअक्षर कियेऊ । सोऊ पुरुष सुरति कह देऊ ॥

समय-अमर निरक्षर सङ्ग लिय, अर्ध ध्वजा फहराय ॥

पलटि समानिसुरति पुरुष, देहमें अक्षय छिपाय ॥