कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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बोधसागर
अगर छिपाय आप महाराखा । सुरति स्नेह मुख प्रकटी भारखा ॥ प्रथम पुरुष मुख भाषा आई । भाषा अग्र पारस निरमाई ॥ भाषा बचन भया अधिकारा । भाषहिते भा सकल विस्तारा ॥ भाषा वचन पुरुष उच्चार । सो सब सत्यलोक व्यवहारा ॥ भाषा बोल पुरुष उच्चार । सेवहु सत्यलोकके द्वारा ॥ श्वासा सार तार जोरि आना । अधर अमान ध्वजा फहराना ॥ भाषा स्वर बानी अनुमाना । श्वास सार तार जुरि आना ॥ निमिष माहिं अनेक संचारा । बचन समान श्वास गुञ्जारा ॥ नाव स्नेह शब्द मैञ्जारा । (बचन समान श्वास गुञ्जारा) ॥ श्वासा नेह देह भई जबहीं । भाषा सहज बचन भा तबहीं ॥
आगेकी उत्पत्ति प्रकार
प्रथम श्वासकी निकसी खानी । उपजे सुत सुकृत सम आनी ॥ निमिषनेह प्रसन्न सुधारै । नाममूल टकसार उचारै ॥ भो विस्तार निमेश एक गयऊ । " " " " ॥ मूलगुप्त मस्तक नहिं देखा । आदि नाम अमरघर लेखा ॥ पेड़के गहे मूल धनु गाजा । सोई मूल फूल फल लागा ॥ पेड़हिं गये मूल औ शाखा । मूल मिले तबहि रचि शाखा ॥ गुप्त मूलते प्रकटी शाखा । पल्लव मूल पड़ै गहि राखा ॥ पेड़ देखि पल्लव फैलावै । पल्लव फैले अन्त नहिं पावै ॥ पल्लव चढ़े पेड़ चित राखा । मिले मूल तब फलरस चाखा ॥ आदि अन्त दुइ पेड़ समाना । आपहि राखा आप पहिचान ॥ जागि सुरति पुनि पेड़ निहारा । फलरसि चाखी बीजगहि डारा ॥ बीजाते सोई फल होई । फल रस लेह मूल तजि छाई ॥ जागि सुरति सपन मिट गयेऊ । दुई चितमेटि एकचित भयेऊ ॥