भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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श्वासगुप्कार

( ९ )

दूजी श्वासा प्रभुकी देहा । उपजे सहज सुख नेहा ॥ तिसरी श्वासा फूल सनेही । जाते भई हमारी देही ॥ देह माँहि द्वे रहे विदेही । देह मन भये ज्ञान रस देही ॥ कायामे काया रही वासा । सब चौथी श्वासा परकाशा ॥ काया अविहर अविहर वासा । " " "

चौथी श्वासा निकरे चाहा । तब चिंता उपजी मनमाहा ॥ चिंता प्रकट भई दिल जबहीं । आपते आप भुलाने तबहीं ॥ आपु शरीर आपु तब झाका । विमलप्रकाशउदित तन ताका ॥ कायारूप भई उजियारी । निर्मलदेह विमल तन भारी ॥ विमल प्रकाश कीर्ती जब देखा । वर्णत बने न ताकर लेखा ॥ विमल प्रकाश किरण जब देखा । " " "

कला अनंत अंत नहीं पावे । बरणत जिह्वा लक्षण आवै ॥ देखत रूप लीला अधिकारा । आप आपनपौ कीन्ह विचारा ॥ कमलकरि महाँ भा उजियारा । देखा आदि अंत विस्तारा ॥ आपु बरन सब देखा जबहीं । दुविधा रूप झाँई भइ तबहीं ॥ कमल झांकी प्रभु देखा जबहीं । हमरे रूपको दो सर अबहीं ॥ इतना कहत बार नहीं लाये । निकसि कमलते बाहर आये ॥ छोँडी कमल प्रभु भये निनारा । तबहीं कमल भया अंधियारा ॥ कमल झाँकि देख्यो सबन्यारा । भये तिमिर तनतेज अपारा ॥ अँधकार प्रभु देखा जबहीं । काया ज्योति मलिन भइ तबहीं ॥ निमिषि एकम संशय आवै । निमिषि एक आनंद जानावै ॥ विस्मय हर्ष दोउ एक ठाऊँ । एक पुरुषकर दोउ सुभाऊँ ॥ आपुते आय भया अतिचारा । तेहि अवसर प्रभु वचन उचारा ॥ उठि अब जो शब्द सतभाऊ । कमलमध्ये कस शून्य रहाऊ ॥ घटही वचन पुरुष संधाना । तब चौथी श्वासा बंधाना ॥