भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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( १० )

बोधसागर

तेज पूँज भौ गर्भ शरीरा । फूँकी नालदेखा बल वीरा ॥ कमल नाल धरि फूँका जबही । चौथी श्वासा निकसी तबही ॥ फूँका कमल तेजके नेहा । चला प्रसेव पुरुषकी देहा ॥ फूँकत कमल बार नहिँ लागा । भयउजियार तिमिर सब भागा ॥ कारण काल पट यहँ धोका । दुई चित मूल तेजमह रोका ॥ चौथी श्वासा विषयी सनेही । मोह विकार धर्मकी देही ॥ मोह विकार तिमिर अधिकारा । ता सँग भयउ धर्म औतारा ॥ तिसरी श्वासा गुप्तहि राखा । तासो जोर निरञ्जन भाखा ॥ फूँकत कमल तेज गरि गयऊ । तेहितेकाल ज्योति धरि भयऊ ॥ महा बलि देह धरिके बैठा । जानो धर्महीं हौ जेठा ॥ तेज लगन श्वासा अनुसारा । ताते धर्मराय बरियारा ॥ तेजतिमिर संग शून्य निवासा । सबतर भयो काल परकाशा ॥

समय-आसा धरे बहुत दिन बीते, प्रेम भक्ति लौलीन ।

आश धरे बहुतयुग गये, भक्तिभाव आधीन ॥

(ज्योति तहाँ लगिज्वालतेभाखा । तेहि ते नाम निरञ्जन राखा) ॥ निराकार आकार धराये । जोति काल बहुनाम कहाये ॥ चौदह द्वार काल जो भाखै । सुनि सो सबै नाम मन राखै ॥ सांकित अण्ड भयो प्रचंडा । फूटत अण्ड भयो बहु खण्डा ॥ चौदह बुन्द अमि ढरि गयऊ । चौदह अंश ताहिते भयऊ ॥ चौदह पौरिया ढरि बैठारा । इन चौदह बहु ज्ञानपसारा ॥ आपसमान सबै रचि राखे । चौदह कोटि ज्ञान तिन भाखे ॥ चौदह अंस धरम तहाँ पाये । ते चौदह विद्या तहाँ पाये ॥ वही चौदह अगम अपारा । तापर काल धरम बटपारा ॥ धरम समाधि चितही यमधारा । चौदह मोह को तनवारा ॥