भारतकोश
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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

धर्मबोध

( २०३ )

जिस प्रकार हार्थी स्पर्श विषयमें लुब्ध होकर और भवैरा गन्धमें लुब्ध होकर बन्धनको प्राप्त होता है उसी प्रकार पठित-मूर्ख संसारमें फँसता है।

वह स्त्रियोंमें लुब्ध होता है, उन्हींका संग करता है, उन्हींका अपनी वाणी द्वारा निरूपण करता है और नीच काममें प्रवृत्त रहता है।

जिससे उसके मानकी हानि होती रहती है उसीको दृढ़ रखता है, और अपनेको शरीर समझता हुआ सदा उसीके लालन पालनमें लगा रहता है।

सद्गुरु परमात्माकी स्तुतिको छोड़कर सत्य धर्म ग्रन्थोंका लिखना और रचना छोड़कर सांसारिक मनुष्योंकी प्रशंसा करता है उनकी मिथ्या बड़ाई करता है, उनके विषयमें प्रशंसा करता है, उनके विषयमें कविता बनाता है, जिससे कुछ सांसारिक लाभ हो उसीकी बड़ाई करता है, जो दृष्टिगोचर होता है उसीको सत्य जानता है ऐसा जो विद्वान हो वह मूर्ख ही कहलाने योग्य है।

स्त्रियोंके अवयवका वर्णन करता है, शृङ्गार रसकी कवितामें अपना समय बिताता है, नाटकादिके हावभावके वर्णन करनेमें अपनी लेखनीको घिसता है वह ईश्वरको भूल जाता है।

वैभवको प्राप्त हो सर्व प्राणीमात्रको तुच्छ समझता है और स्वयम् नास्तिक बनता है।

व्युत्पन्न, वैरागी, ब्रह्मज्ञानी, संन्यासी, साधु, महंत आदि उच्च उपाधिको धारण करनेपर भी प्राकृत जनोंको व्यापार धन्धाके भविष्य कहनेका काम उठाता है वह महामूर्ख है और उसे दम्भी विषयाभिलाषी पठितमूर्खके पदको प्राप्त हुआ जानना।

( २०४ )

बोधसागर

जो किसीकी भी पूरी बातको सुने बिना उसके गुणदोषमें छिद्र ढूँढने लगता है और दूसरेकी उन्नति देख नहीं सकता है ऐसे दूषित विद्वान्को पठितमूर्ख कहते हैं।

भक्तिके साधन, वैराग्य और भजन बिना भक्त और शाम-दमादि साधन बिना ब्रह्मज्ञानी, और सत्यासत्यकी परीक्षा बिना अपनेको केवल मुखसे ही भक्त, ब्रह्मज्ञानी और पारखी कहलानेकी कामनावाले पठित पुरुषोंको मूर्ख कहा जाता है।

स्वधर्मके नित्य नैमित्तिक कर्मोंमें श्रद्धाहीन, ऊंचकुलमें भी जन्म धारण कर नीच कर्मोंमें प्रवृत्त होनेवाला विद्वान् मूर्ख है, उसका आदर करनेवाला यदि नीच पुरुष भी हो तो उसकी मिथ्या प्रशंसा करता है और पीठ पीछे उसकी निन्दा करता है जैसे पठितमूर्ख जानो।

“मुखपर एक और पीठ पीछे दूसरा” ऐसी जिसकी आदत हो, बोलनेकी बात अलग और करनेकी अलग हो, संसारमें अत्यन्त प्रवृत्ति करने पर भी परमार्थको धिक्कारे और अपने वचनको सिद्ध करनेके लिये अपने ज्ञातव्यका आश्रय ले। सांची बातको किनारे छोड़कर लोगोंकी रुचिके अनुसार बात करे, ऐसे अपने जीवनको पराधीन और मृतक करनेवाले विद्वान् को पठितमूर्ख जानना।

जो लोगोंको दिखलानेके लिये दम्भ किया करता है, अकर्तव्यको कर्तव्य मानकर उसमें प्रवृत्त होता है, मनमें सीधा और योग्य-मार्गको जानते हुए भी लोभ (लालच) से, अथवा मान-बड़ाईकी इच्छा, या किसी भी परके पक्षपातसे सत्य त्याग करके टेढ़े रस्ते चलता है उसे पारखी महामूर्ख और ज्ञानियोंकी सभासे बाहर समझते हैं, यदि वह उच्च आसन पर भी बैठा हो तो क्या ?

धर्मबोध

( २०५ )

रातदिन उत्तम उत्तम ग्रन्थोंका श्रवण करते हुये भी अपना अवगुण त्याग नहीं करता है, अपना हित आप समझता नहीं है, तत्त्वनिरूपणके श्रवण मननको जहाँ उत्तम मनुष्य बैठते हों उनकी मसखरी करता हो, वह मिथ्याज्ञानी कदापि अपना हित नहीं कर सकता ।

अपना शिष्य अनधिकारी होकर अपमान करने लगे तब भी उसकी आशा न छोड़े, ग्रन्थोंको सुनते, या विचारते अथवा किसीके मुखसे उपदेश द्वारा अपने कर्तव्यकी स्वामी ( कसर ) कुछ मालूम हो तो कोषित होकर गडबड़ करने लगे तो यदि वह लोगोंमें बहुत बुद्धिमान् भी प्रसिद्ध हो तो भी उसे महामूर्ख जानना ।

वैभवमें मग्न होकर सतगुरुकी उपेक्षा करे और अपनी गुरुपरम्पराको याद करे उसे भी मूर्ख जानना; यद्यपि वह वैभवप्रतापसे जगतमें बुद्धिमान् कहलाता हो ।

जो ज्ञानकी बात कहकर धन जमा करता है, कृपणके समान धन भोगता है, धनके लिये ही परमार्थकी बात करता है, स्वयम् तो कर सकता नहीं और दूसरोंको वही बातें सिखाता और ब्रह्मज्ञानका उपयोग अनधिकारी विषयलम्पट लोगोंके समक्ष करता हो, ऐसा महंत, गोस्वामी और साधु संत भक्ति-मार्गको भ्रष्टकर पक्षपात द्वारा वैर विरोध बढ़ानेवाला है ।

परिवार त्यागकर साधु वेष धारण कर लेनेवालोंको संसार तो छूट ही गया और इधर परमार्थका भी साधन नहीं हो सका ऐसा जो धर्मर्ममार्गदाको भ्रष्ट करनेवाला हो वह धर्मविरोधी मूर्ख कहलाता है ।

( २०६ )

बोधसागर

जिस धर्मका स्वांग बनाया हो, उस धर्मके ऊपर पड़ते हुए विधर्मियोंके आक्रमणकी उपेक्षा कर जो स्वमान मर्यादाकी मरम्मतमें लगा रहे उस धर्मविध्वंसी मिथ्या स्वांगधारीको मूर्ख समझना चाहिये ।

स्वधर्मकी जिन बातों और कर्मोंसे हाँसी होती हो, उन कर्मों और बातोंमें प्रकृत होकर, स्वधर्मके सिद्धान्तको न जाननेवाले, अथवा उसकी निन्दाकरनेवाले धर्म दूषियोंसे जो मेल मिलाप बढ़ावे वह धर्मघाती मूर्ख है ।

इस प्रकार संसारमें भले कहलाते हुए भी मूर्खताके ही वनमें भटकनेवालोंका संक्षेपसे वर्णन किया । सज्जन जन इसे विचारें और आत्मसुधारके मार्गको पक्षपात रहित होकर ग्रहण करें ।

इति श्रीधर्मबोध प्रथम भाग समाप्त

प्रारंभिक पृष्ठ (कमालबोध)

भारतपथिक कबीरपंथी स्वामी श्रीयुगलानन्द (विहारी) द्वारा संशोधित

खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई-४

नं. १० बोधसागर

संस्करण : फरवरी २०१९, संवत् २०७५

मूल्य : २१० रुपये मात्र ।

मुद्रक एवं प्रकाशक:

खेमराज श्रीकृष्णदास, TM

अध्यक्ष : श्रीवेंकटेश्वर प्रेस,

खेमराज श्रीकृष्णदास मार्ग,

मुंबई - ४०० ००४.

© सर्वाधिकार : प्रकाशक द्वारा सुरक्षित

Printers & Publishers : Khemraj Shrikrishnadass, Prop: Shri Venkateshwar Press, Khemraj Shrikrishnadass Marg, 7th Khetwadi, Mumbai - 400 004.

Web Site : http://www.Khe-shri.com Email : khemraj@vsnl.com

Printed by Sanjay Bajaj For M/s. Khemraj Shrikrishnadass Proprietors Shri Venkateshwar Press, Mumbai - 400 004, at their Shri Venkateshwar Press, 66 Hadapsar Industrial Estate, Pune 411 013.

श्री कमालबोध ग्रन्थ

बोधसागरे-

कमालबोध


भारतपथिक कबीरपंथी

स्वामी श्रीयुगलानन्दद्वारा संगृहीत

खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई-४

भारतीय

प्रहिलासूत्र

प्रहिलासूत्र

भारतीय प्रहिलासूत्र

भारतीय प्रहिलासूत्र

प्रहिलासूत्र

सत्यनाम

श्री कबीर साहिब

A faint, stylized illustration of a seated Buddhist figure, possibly a Bodhisattva or Buddha, holding a bowl and a staff, surrounded by a halo.

ॐ नमः शिवाय

सत्यमुक्त, आदअदली, अजर अचिन्त, पुरुष, मुनींद्र, करुणामय, कबीर, सुरति योग संतायन, धनीधर्मदास चुरामणिनाम, सुदर्शन नाम, कुलपति नाम, प्रबोध गुरुबालापीर, केवलनाम, अमोल नाम, सुरतिसनेही नाम, हक नाम, पाकनाम, प्रगट नाम, धीरज नाम, उग्र नाम, दयानामकी दया, वंश- व्यालीसकी दया ।

अथ श्रीबोधसागरे

कमालबोध प्रारम्भः

एकत्रिशस्तरङ्गः

चौपाई

शाह सिकन्दर दिल्ली सुलताना। बैठे तख्त करे रजधाना ॥ बहुतेक दिवस आनन्दमें गयऊ। एते कायाको बेदन भयऊ ॥ देह अग्नि उठी अधिकाई। रैन दिवस शाहा सुधि नाहीं ॥ बहुतेक इलम कियो सुलताना। फेर औलिया सिद्ध सुलाना ॥ कोई विधि जलन दूर नहीं जाई। दिन दिन उठी चले अधिकाई ॥

( २ )

बोधसागर

शाहसिकन्दर प्रतिज्ञा

दोहा—दीन दुनीका मैं धनी, मेरा जाय प्रान । मेरा बेदन जो हरे, मनवाँछित पावे दान ॥ ऐसा कोई औलिया नाही । मेरे तनकी तपन बुझाहीं ॥

वजीर वचन

कहै वजीर सुनो सुलताना । काशीमें एक फकीर सयाना ॥ वहां एक हिंदू फकीर रहाई । चौदहसौ वर्षजिनउमरधराई ॥ सब हिन्दू कदमों पै जाहीं । सब हिन्दूके पीर कहाहीं ॥ उनको चणारविन्द धरो तुम जाई । दर्शन करत जलन मिट जाई ॥ रामानन्द कहैं सुनी बड़ाई । शाह सवारी काशी आई ॥

दोहा—आय दुनीके बादशाह, सब संगहि दललाय ।

जलन मिटनके कारने, कदमों पहुँचे जाय ॥

चौपाई

भयो प्रभात जलन अधिकाया । जब रामानंद कहै दर्शन धाया ॥ शाह सिकन्दर दर्शन आये । सबही अमीर सङ्ग चलिधाये ॥ आये मण्डप आये सुलताना । रामानंद दिल रहै खिसियाना ॥ शाहको अग्नि उठी अधिकार्ई । भये विकल सही ना जाई ॥ त्राहि त्राहि तब कीन पुकारा । रामानन्द तब मुखफेरि सिधारा ॥ देखि दशा भई अति क्रोधा । कहै वजीर सुनो सब योधा ॥ देखो इस काफिरकी गुमराही । चढ़त क्रोध मोंहि रह्योनजाही ॥ दीन दुनीके शाह सुलताना । जिनको नमै सकल जहाना ॥ सो काफिरके कदमो आवे । देखत तेहि काफिरसुँह फिरावे ॥ ऐसो काल चढ़यो बलवंडा । नफरके घटमें भयो परचण्डा ॥ ऐसो तेग चलायो जायी । काटयो शिरधड दूर गिरायी ॥ ताह अवसर अचरजअस भयञ्ज । देखत दुनी अचम्भो ठयञ्ज ॥

कमालबोध

( ३ )

कटे अङ्गसों धार बहायी । आधा रक्त अरु दूध चलाई ॥ शाह सिकंदर अन्देशा माने । भेद न जाने मनमाँहि तवाने ॥ स्वामीके तन चलत दुइ धारी । हाहाकरे तब दुनिया सारी ॥

दोहा-गुरु रामानन्दहि मारिया, काशी नगर मैझार ।

शाहके वेदन बहु बढचो, त्रास भई संसार ॥

यक तो वेदनको दुखभारी । दुसरे अचरज परी अगारी ॥ कहैं सिकन्दर मन अकुलायी । ऐसा कोई औलिया नाही ॥ हमरे तनको तपन बुझावे । बहुरी अचरज को भेद बतावे ॥ सबही कहै सुनों सुलताना । इनका शिष्य यक अहे सयाना ॥ मरल गौ कह बार जियाया । बहुतक अचरजतिनदिवलाया ॥ रामानन्दहु ते अधिक बड़ाई । सत्यकबीर कहैं सब ताई ॥ तिनको दर्शन करिये शाहा । सो पुनि कहिहैं अचरजकोराहा ॥ सुनत वचन सिकंदर भाई । कीन दर्श कबीर पहुँ जाई ॥ शाह सिकंदर दर्शन आये । मिटिगयीतपनसबहुःखमिटाये ॥ जबही शाह कियो दीदारा । मिटि गयी तपनअग्निकीझारा ॥ कहे शाह तुम सच्चे साई । तुमरे दर्श तपन बुझाई ॥

दोहा-जबही तपन बुझायउ, सतगुरु दीनदयाल ।

भइ प्रतीत तब शाहको, भयो शिष्य तेहि बाल ॥

चौपाई

भयसुरीद जुलहाके आयी । तब हा-जुलकरेन-नाम धराई ॥ ज्ञान ध्यान चरचा बहु कीन्हा । शाहसिकंदर शरणजब लीन्हा ॥

१-इस शब्दके ऊपर बहुत विचार किया, किन्तु शुद्धशब्दका पता नहीं लगा जुल करन न तो फारसी या अरबी शब्द है न संस्कृत या हिन्दी । कमालबोधकी एकही प्रति मेरे पास है जो सम्मत १९११ का लिखा हुआ है । विशेषता यह है कि यह पुस्तक खास पं श्री पाक नाम साहबके समयमें उन्हींके हुजूरमें रहनेवाले एक संतकीलिखी हुई है तथापि इसमें इतनी अशुद्धियां हैं कि एक २ चौपाईको पढ़नेमें दो दो मिनट लग जाता है तथापि हजारों सन्देह सहित कापी लिखी जाती हैं ।

नं. १० बोधसागर -२

( ४ )

बोधसागर

सतहतर लाखसो बीरा लीन्हा । सबहीं जीव अमरकर दीन्हा ॥ सतहतरलाखजिवलोकसिधाने । अपने अवगुनसबगये हिराने ॥ तब सिकंदर यक विनती लावा । मिहर गुरुकरि ताहि लखावा ॥ अहो साहिबमोहिंग्रन्थ लखाई । बाचे ग्रन्थ दिल समझाई ॥ तब सदूर हुकुम अस कीना । जस मांग्योशाहतसतेहिदीना ॥ नवी सिन्दको लेहु बुलायी । कागजकमलसबसाथलिवायी ॥ शाह सिकन्दर तुरत बुलाये । सवाला खसोतेही बेर आये ॥ सवालाख देह बीर तब कीना । सोउ सिकन्दर सब सुधिलीना ॥ तनमनधन जब अर्पण कीना । शिरके साट साहब चीन्हा ॥ फिरे शाह जब दिल्ली आये । काजी मुछा सब सुनि पाये ॥ शेखतकी रहे उनपर पीरा । सब मिलि गये उनके तीरा ॥ सब मिल कहैं सुनो मम पीरा । शाहसिकंदर कसभये अधीरा ॥ काशी माहिं गये जब शाहा । कबीरहि कीन्ह गुरु नरनाहा ॥ सुतन तकी बहुते रिसियाना । का तुम कहौअसबातबिराना ॥ ऐसा कैसा ख्याल खिलायो । कैसे मोरा मुरीद फिरायो ॥ चलो जाइये शाह दरबारा । सब मिलि पूछें ज्ञानविचारा ॥ जुलहा मुरीद कससो भयऊ । सो सब पूछें तिसका भैऊ ॥ केहि कारण मुरीद सो हुआ । काजीमुल्ला सब कहैं सूआ ॥ सब मिलि आये भरे दरबारा । बैठे तख्तशाह सरदारा ॥ तिन कहैं आदरशाहभलदीन्हा । तिन पुनि प्रश्न पूछिसो लीन्हा ॥ कहो शाह तुम कहाँ मत पाये । कैसे अपना ईस्म फिराये ॥ काफिर कहैं मुरीदकस तुम हुये । काजीमुल्ला सब कहैं सुये ॥ दीनके घर कहैं टोटा भाई । दीनका कर आदिमो आई ॥ सो तुम कैसे दियो मिटायी । चार बिहिस्त अछाहफरमायी ॥

१ नाम

कमालबोध

( ५ )

इनकूँ तजि आगे कहँ जाओ । चार मुकाम लाहूत सो भाओ ॥ दीन इस्लाम असल दरसायो । सोतुम छोड़ि कहँ भटका खायो ॥ दीन दुनीके तुम सरदारा । कैसे मेटचो दीन तुम्हारा ॥ खुदाके अहदी काजी कहावैं । दीन इसलामको राह बतावैं ॥ दीन इसलाम असल है भाई । और सबे जग कुफर चलाई ॥

सिकन्दर वचन

मुनत सिकन्दर उत्तर दीन्हा । सबको मन अचरज असभीना ॥ भूले काजी भूले मुलाना । तिनहू भूले लाये फरमाना ॥ दीनका घर दूर है भाई । बिन जाने तुम असल ठहराई ॥ किसने विहिस्त बैकुण्ठ बनाया । दीनका असल किसने फरमाया ॥ दोहा-काजी मुछा भूलिया, भरमें सकल जहान । मुहम्मद भूले संदेशसे, सोई लाये फरमान ॥

चौपाई

एते सतगुरु दिल्ली आये । शाहसिकन्दर बहुत सुखपाये ॥ जमुना बिच है महल सुबारक । बैठे पीर जहाँ होइके फारक ॥ काजी मुछाको लिये बुलाये । शेखतकी तुरत चलि आये ॥

शेखतकी वचन

कहशेखतकी जुलम तुम कीना । मुरीद हमार फिरायके लीन्हा ॥ काह कियो सुनो मति धीरा । जुलम किया तुम दास कबीरा ॥ कौन इलम शाइको दिखलायी । कौन सुधि तुम नाम सुनायी ॥

कबीर वचन

मियाँ हम इलम फकीरी बोलेँ । समरथ नाम लिये जग डोलेँ ॥ हम दुवैश हैं दर्प दिवाना । सतकी चाल चलेँ जग जाना ॥

काजीमुल्ला वचन

निराकार जिन कुरान बखाना । नूर जो उत्तरयो सब जग जाना ॥ कही खुदाकी और निनारा । इसका हमको कहो विचारा ॥

( ६ )

बोधसागर

कबीर बचन

निराकार है खुदाका कीया । इनको तीन लोकसों दीया ॥ इनहीं रचे जो वेद कुराना । विहिस्त वैकुण्ठ इनहीं जो ठाना ॥ दोहा-निराकार निर्गुन कहैं, रांचि रहे संसार । वेद कुरान इन्हीं किये, साहिब चूर निनार ॥

काजी मुखा बचन

ज्ञान कियेसे बनि नहिं आयी । अपनी अजमत देहु दिखाई ॥ अजमतसे हम सच करि माने । नहिं तो करहु झूठ अभिमाने ॥ दीनका घर सब झूठ परायी । तो पुनि इलम तुम्हार चलायी ॥ जो कबु इलम हमार चलायी । तो हम तुमको लेब मिलायी ॥ दोहा-हमारे दिल ऐसी लगी, फिराय सिकन्दर साय । सखून आदिका मेटिया, सब दिन दिये उठाय ॥ हमारे दिल ऐसी लगी, तुम कच्चे प्याला पिलाय । कहे शेखतकी कबीरसे, फिराय सिकंदर साय ॥

कबीर बचन

मियाँजी आवे तो खावे सही, हम केहि बसैं तन माहिं । तुम खाये सकल जहानको, तौ भी छक्के नाहिं ॥ एक मुर्दा यमुना में आया । सो जुलकरनके नजर पराया ॥ देखहु यारो उसकी जिदगानी । कहा देखा इन जगमें आनी ॥ ओछी उमर यह कहैं पाई । सुरत शुभान कछु कहा न जाई ॥ इसका जीव गया किहि ठायी । काजी मुखा कहो समझायी ॥ शेखतकीको आगम नाहीं । हमारे पुत्र कमानेको जाहीं ॥ दुर् भोमको दीन प्याना । उलटा नाव यमुना बहराना ॥ दूबे जीव जो एक हजार । सुरदा बहे जायँ असरारा ॥

कमालबोध

( ७ )

देखो पीर किताब कुराना । हम करें तुमको सन्माना ॥ यहि मुर्दाको लेहु हँकराई । हम तब रहें तुव शरनाई ॥ जो यह मुर्दा आवे नाहीं । तब तुम कर सब झूठ बड़ाई ॥ सखुन तीन काजी हँकारा । सुरदा बहाजाय मझधारा ॥ दिखाओ कबीर इलम फकीरी । यहि सुरदाको लेहु हँकारी ॥

काजीमुखा वचन

हम सब धरे तुम्हारे पाई । जो यह सुरदा लेहु बुलाई ॥ जो यह मुर्दा आवे नाहीं । तो तुम झूठे शाह भरमाई ॥ कुदरत कमालकहिकबीरबुलावा । सुरदादौरीसमरथचरणसमावा ॥ काजीमुखा देखें ठाडे । मुर्दासे जिन्दा करि डारे ॥ सतगुरु अंकमिलाप जब कीना । इलम फकीरी उसको दीना ॥ दोहा-सुरदासों जिन्दा किया, दिलासों दीन मलाल ।

शाह परतीत दिखाइया, उत्पन्न दास कमाल ॥

चौपाई

शेखतकी हरषे मन माई । लाय कमाली भेट चढ़ाई ॥ दोऊ सुत अहै तुम्हारी शरना । तुमसे मिटे जरा और मरना ॥ शेखतकी तब शीश नवावा । बेहद साहब सच हम पावा ॥

कबीर वचन

जाहु कमाल कोइमुल्कचेताओ । चौरासीसे जीव मुक्ताओ ॥ चले कमाल तब शीश नवाई । अहमदाबाद तब पहुँचे आई ॥ दरियाखान पठानहिं नामा । तहाँ जाय पुनि कीन्ह मुकामा ॥ साठ मुर्दाद किये तेहि ठाई । अधिक प्रीति पठान जनाई ॥ तन मनसे बहु सेवा कीन्हा । इलम फकीरी उसको दीना ॥

कमाल वचन

सुनो दरियाखान सखुन हमारा । इलम फकीरी सदा बड़भारा ॥

( ८ )

बोधसागर

जो तुम चाल चलौ भरपूरी । तब तुम पहुँचो पुरुष हुजुरी ॥ कबहुँ तुम जो चूको चेला । शिकस्त करे तब तुमको काला ॥ जो तुम चेला चूक करो जाई । तब तुम परिहो चौरासी माई ॥ इतनी सिखावन उसको दीया । दिन सोलह उसके घर रहिया ॥ दोहा-इल्म फकीरी अलमस्त्ना दिवाना, कीना एक उपाय । एक पाव बाँधै वेदको, दूजे कितेब बँधाय ॥

चौपाई

वेद कितेब जो बडयारा । चले जात हैं नगर मैझारा ॥ मध्य चौकमें खड़े भय जाई । प्रानी बहुत तमाशे आई ॥ बायाँ पाँव हिन्दू दिखलावे । बाँचे वेद वैकुण्ठ सो पावे ॥ दहिना पाँव दीन दिखलावे । पढ़े कुरान बिहिश्त को जावे ॥ वेद कितेब दोऊ बड़ भारी । त्राहि २ भयी दुनियाँ सारी ॥ दोनों दीन पाँव तले दीना । ऐसा है कोई अलमस्त नवीना ॥ चले सकल पुनि दिया पुकारी । जाय खड़े भये शाह दरबारी ॥

दोहा-तुमहौ अहमद शाहडा, अचरज देखो आय ।

वेद कितेब पाँवों तले, दोऊ दीन मिटाय ॥

चौपाई

कोपे अहमद आप सुलताना । जड़ो जँजीर फकीर दिवाना ॥ जड़ो जँजीर मुहकमकर ऐसी । ऊपर रहो मुबकिल दशबीसी ॥ रहै न सयानी भये विनाया । बाहर चौकमें खड़ा दिवाना ॥ सोई जोड़ा फिर दिखलावे । दोनों दीनको फिर समुझावे ॥ फिर जाय सब कीन पुकारा । हैं जिन्दा खड़ा चौक निर्धारा ॥ कहे शाह मुबकिलसे तबही । कैसे गया जिन्द पुनि जबही ॥

मुबकिल वचन

कहे मुबकिल सुनु सुलताना । ऐसी अजमत हम नहि जाना ॥

कमालबोध

( ९ )

सात बेर जो जडे जँजीरा । बाहर चौकमें खड़ा फकीरा ॥

अहमदशाह वचन

अबकी लाय जमीमें गाढो । पांच २ ईंटा सब मिलि मारो ॥ जो कोई दया करे उसपर जाई । उसके घरको देहु जलाई ॥

दोहा-लाहे लागि कमालको, ऊपर ईंटा अपार ।

तन मनकी कछु सुधि नहीं, इलम फकीरी सार ॥

चौपाई

दरियाखान कचहरी जावे । आगू पड़ी भीड़ दिखलावे ॥

कहे सुबकिल सुनो दरियाई । कमालके ऊपर है कठिनाई ॥

इलम फकीरी सैल तुम पाई । मारो ईंटा फकीरके ताई ॥

जो तुम इनपर ईंटा न डारो । तब तुम सारी खिदमत हारो ॥

मारो ईंटा होयकर राजी । नहींतो तुमपर होय शाहनराजी ॥

दरियाखान वचन

कौन उपाय करें में साई । कैसे सुरशिदपर ईंट चलाई ॥

मेरी इलम फकीरी जाई । जो मैं इनपर गढ़ कर जाई ॥

तब हजरत जसपर बहुत रिसाई । तबहीं फूल एक लीन उठाई ॥

दरियाखान विवेक निधाना । भेद फूल मन करे तिवाना ॥

जो फूलै हम मरिहौ जाई । मेरो जन्म अष्ट होय जाई ॥

देखि गुनावन शाह रिसाना । कठिन बोध प्रकट दिखलाना ॥

देखि क्रोध दरिया जब लीना । पखुरी एक फूल सो छीना ॥

सोई पखुरी गुरुपै चलिया । लागत पखुरी अचेत है परिया ॥

दरियाखान दौरि ढिग गयऊ । पहर एक तक विन्ती लयऊ ॥

पहर एक मँहे चेत तब आवा । दरियाखान तब अरज सुनावा ॥

सुनहु सत गुरु विनती मोरी । इतनी ईंटा परी तुम धोरी ॥

इतनी ईंटा परी तुम संगा । तब तुम काहे न मन्यो अंगा ॥

हमतो फूलन पखुरी डारा । ताते तुम होय पड़े बेकरारा ॥

( १० )

बोधसागर

दोहा-याका मरम पाया नहीं, सतगुरु कहो समुझाय । एतिक ईटा मारसे, तुम कहें ना विकलाय ॥ एकै पखुरी फूलसे; लागी इतनी चोट । होय विकल धरनी गिरे, हो गये लोटम पोट ॥

कमाल वचन

बिना भेद उन ईटा डारा । तुमतो हमको चीन्हके मारा ॥ मोंसे इलम फकीरी पाई । ताते तुम मोकूं मारा भाई ॥ यह दुनिया है कालका चारा । इसपर चले न अमल हमारा ॥ ताते देह छांडिहमभये नियारे । डारे कोटिक ईट अपारे ॥ देखत तुमको देह समोये । शिष्य को दर्शनदेहमहँ होये ॥ भली कीन तुम मोको मारा । अपनी इलम फकीरी हारा ॥ बहुतेक ज्ञान हम तोहिं सुझावा । तौहु तुम मम मरम न पावा ॥ दोहा-इलम फकीरी चूकी तेरी, सुनहु खान पठान ।

दोजख जाहु मौजमें, यह सतगुरुका फरमान ॥

दरियाखान वचन

सब दुनिया खोजत कहँ जाई । सुझको कौने दोजख फरमाई ॥

कमाल वचन

भूत खानिमें रहो समाई । सब जग जाने तेरे ताई ॥ जानि बूझि तुम मोको मारा । सब भूतनका बनो सरदारा ॥ सब भूतनमें करो बादशाही । सबमें तेरी चले दुहाई ॥ एती खबर शाह सुन पावा । जिन्दांकहँशिरकाटनफरमावा ॥ कहे दरियाखान सुनो सुलताना । जिन्दानहींकोईऔलियाजाना ॥ यह सुनि शाह बहुत रिसाया । तुरतहि पोस्तें कादि मँगाया ॥

१-कमाल साहब उस समय जिन्दा वेधमें थे । जिन्दा वेधका हाल देखो ग्रन्थ जिन्दा बोध आगम ज्ञानमें : २-चमड़ा ।