भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

पृष्ठ 1624, कुल 2136 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1624

( १४ )

बोधसागर

तीनों घर कर तीन सुभाऊ । शीतल तेज सत्यकर भाऊ ॥ अमी अग्रभा तेज शरीरा । उपजे चंद्र सूर दोऊ वीरा ॥ अग्रतेज औ सत्य सुरंगा । तीन शक्ति उपजी तेहि संगा ॥ कला अनंता शक्तिके पास। लीला बहुत विचित्र प्रकाशा ॥ तिनहु संग अहै द्वौ वीरा । इक शीतल इक तेज शरीरा ॥ तीनों शक्ति अंग दोउ वीरा । काया मथिकथि कहै कबीरा ॥ अभयहि शक्ति है चन्द्र सनेहा । ईगला नारी संग उरेहा ॥ उलँगनी शक्ति रहे सुख मरना । चैतन शक्ती सूर्य प्रमाना ॥ सबसे मध्य जहाँ सुरति तरंगा । सुरति निरति कायाके संगा ॥ नख शिख ज्योति विराजे अंगा । शोभा विशद मनोहर संगा ॥ पांचतत्व तिया शक्ती राजै । ताहि सङ्क दोय वीर विराजै ॥ तत्वरैंग शक्ती न घर कीन्हौ । तेहि मई उपजनि पारस दीन्हौ ॥ उपजनि पारस भा परसंगा । उपजी ज्योति कला बहुरैंगा ॥ पैचई श्वासा देह समाई । उपजी रूपकला अधिकार्ई ॥ जागी देह अखंडित अंगा । शोभित भई कला प्रसैंगा ॥ उपजनि अँश पुरुषके संग। भाखों भेद कला बहु रैंगा ॥ जब कायामो आई श्वासा । जागि ज्योति पुहुप प्रकाशा ॥ उपजा रूप अखंडित बानी । बोले बचन पुहुपकी खानी ॥ मधुर बचन और लीला धारी । देखि रूप तब पुरुष दुलारी ॥ हुये मधुर पुनि लीला धारी । वचनरूप लखि आप दुलारी ॥

समय-पांचतत्त्वतिये शक्ती संग, चन्द्र सूर्य दोऊ वीर ।

तीनों घर श्वासा रमें, बाहर भीतर तीर ॥

चौपाई

उपजी रूप रंग की खानी । बोले अमी विरहकी बानी ॥ उपजी कन्या कला अनूपा । पुरुष उत्पन औ पुरुष स्वरूपा ॥