कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंश्वसगुञ्जार
( १५ )
जेहि पारस सब उत्पत्ति कीन्हों । सो पारस कन्या कहैं दीन्हा ॥ पारस हाथ महा बल जाना । तब कन्या कहभा अभिमाना ॥ उपजा रंग रोस गंभीरा । बैठी अमी सरोवर तीरा ॥ यहि विधि सोरह सुतनिरमाया । भिन्न भिन्न अस्थान बनाया ॥ जेहिको जेता तन विस्तारा । तेहिको तैसा लोक सुधारा ॥ काहुको लोक सत्ताइस दीन्हों । काहुको सात पांचदशचीन्हों ॥ काहु चौदह काहु बीशा । काहु सत्रह काहु उनीशा ॥ काहुके बारह पन्द्रह तीसा । काहु इकइस बाइस चौबीसा ॥ काहु छतीस बतीसहि भारी । दीन्हों वास भये अधिकारी ॥ सब कह दीन्हों लोक बनाई । आपु रहे प्रभु अच्छप छिपाई ॥ उत्पनि पारस पुत्रिहि दीन्हा । सौपेछ तेज धर्म सों लीना ॥ ताते धर्म भये बली बंड़ा । बैठो सात द्वीप नौ खंड़ा ॥ जिहि विधि रचनापुरुष बनाई । तैसी कला धर्म निरभाई ॥ रचना रचि मनमें पछिताई । शून्य शरीर जीव कहैं पाई ॥ जीवन बिना जीव नहीं होई । रचि अस्थल बैठो सुख गोई ॥ जेहि विधि रचनापुरुषदिकीन्हों । तैसहि धर्म रचा सब चीन्हों ॥ पुरुष समान रची अस्थाना । बैठि शून्यमें करे अनुमाना ॥ जेहि पारस प्रभु लोक बनाया । सो पारथ प्रभु कहाँ छुपाया ॥ सो पारस अब कहवाँ पाऊँ । जेहि पारसते जिव निरमाऊँ ॥ हेरत पारस आये तहवाँ । बैठि सरोवर कामिनि जहवाँ ॥ कामिनि धर्म भये एक ठाँऊ । अंकमिलाय कीन्हबहु भाऊ ॥ शील रंग रस कीन्ह मिलापा । धर्म रोष हो कीन्ह विलापा ॥ कौर विलाप कला बहु भारी । सुख चतुराई हृदय विकारी ॥ कामिनसों कीन्हों व्यवहारा । उपजा रंग रूप रसधारा ॥ धर्म कहैं कामिनिसो बाता । गहे अंग चमकावै गाता ॥