कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( २८ )
बोधसागर
पांचों पांच घाट जल पीवै । दाना घास खाए सुख जीवै ॥ पांचों तुरै पहली पल धावै । छिनबाँधहि छिनछोरि कुदावै ॥ छिनबाहिर छिनभीतर आवहि । पांचों पांच ढुंड फिरि धावहि ॥ सुसरवर पार सो तवे ले आवै । सकल पराश तवे ले आवै ॥ इहि प्रकार जाही ओर आवहि । कोइ नियरे कोई दूर सिधावहि ॥ सुरंग तुरै जोजन भरि जावै । सुसकि योजन डेढ सिधावै ॥ हरियर दुह योजन पर जावै । योजन तीन पति पहुँचावै ॥ हंसा चारि योजन जो जावै । फिरिके दंडवत बेलै आवै ॥ (श्याम रंग आवै नाहिं जाई) ॥
यहि विधि पांचों आवै जाहीं । अपनि अपनि मंजिलके माहीं ॥ पांच तुरै रथ एक सुधारा । ताऊपर मन जीव असवारा ॥ जीव पराहै मनके हाथा । नाच नचावै राखै साथा ॥ पांचों तुरै होय असवारा । घेरे काल कलीके द्वारा ॥ यहि धोखा गहि जीव झुलाना । सत्य शब्दको भाव न जाना ॥ सत्य लोकके तुरै तुखारा । ताऊ पर सतगुरु असवारा ॥ हाहाकार करै चहुँ भाती । करै शिकार दिवस औ राती ॥ रथ ऊपर चढ़ि तुरो कुदावै । मारि जनावर ले घर आवै ॥ मारै बाण जान पर तानी । नख शिर वेधे धाव न जानी ॥ ताहि जानवरके शिर नाही । रुधिर मांस देह नहिं ताही ॥ देखत देहदृष्टि नहिं आवै । बिन देखे असमाने धावै ॥ ( बिन देखे असमानहि धावे । ता धोकेमें जिव डहकावे ) ॥ ऐसा देखो जनावर जोरा । बन औ नगर करै घनघोरा ॥ ऐसो विषम जनावर भारी । मारि पारधी लीन्ह संभारी ॥ मारि जनावर नगर बसावै । वाहि ओल देहे बिलमावै ॥ एक नगर दुह रहे नरेशा । भित्र २ दोनों कर देशा ॥