कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंशवासुञ्जार
( २९ )
ताहि नगर दुइ महल बनाये । दुइ दरवानी तहाँ रह्याये ॥ महा विकार दोऊ दरवानी । दोऊ रायकी सेवा ठानी ॥ करै उत्तपन्न दोऊ रजधानी । धर्म धीर औ आदि भवानी ॥ जो कछु उत्पति शहरमें होई । सो सब बांटे लेहि नृप दोई ॥ बांटे खजाना धरै दुराई । लेखा खरच उठावहि राई ॥ लेखा जानि खरच उठाई । लेखा खरच उठावै आई ॥ एक हवेली दस दरवाजा । अहुठ हाथ गढभीतर राजा ॥ राजा प्रजा सबैहि रहवै । इकछत राज चले नहि पावै ॥ दोउ राहुके शहर बताऊँ । बाहर भीतर प्रकट दिखाऊँ ॥ एक घर बसे मोह नृप भारी । ताकी साज विषय अधिकारी ॥ दूसरे घर विवेक बलधारी । ताकी सात सबै हितकारी ॥ इकघर राजा एकघर रानी । विधि संयोग मिलावै आनी ॥ एकघर सूर एक घर चन्दा । एक तेज विष अमृत मन्दा ॥ इकघर शक्ती इकघर शीवा । इकघर मन एकघर जीवा ॥ इकघर पाप एकघर पुन्या । इकघर सांच एकघर शुन्या ॥ इकघर भक्षक बसे अपारा । इकघर रक्षक है रखवारा ॥ इक राजा कर रक्षक नाऊ । रक्षा करै सदा सब ठाऊ ॥ एक राजाकर भक्षक नाऊ । भक्षै सबै न छाड़ि काऊ ॥ दूनों नृपति एकपुर माहीं । एक रथ चढ़ै एक सङ्ग ताही ॥ प्रथमहि भक्षक होइ असवारा । तहाँ जाय जहाँ है करतारा ॥ विषम सरोवर पहुँचे जाई । पैठि विषम जल माहि नहाई ॥ करि असनान तीर्थ परसै । झाई झलकि ज्योति तहाँ दरसै ॥ दुइ प्रतिमाको दर्शन पावै । आदि निरंजन ज्योतिदिखावै ॥ काली कालरूप विस्तारा । नाना रंग तरङ्ग अपारा ॥ देखि रूप मन हर्ष समावै । ज्यों पतङ्ग दीपक कहँ धावै ॥
नं. १० बोधसागर - ४