भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1689

शवासुञ्जार

( ७९ )

कर पलौ कर रेख विचारै । तिरछि विषमको लेख सुधारै॥ तिरछा रेख विस्नाकी खानी । जस देखै तस बोले बानी ॥ विषम रेख कर्मज अधिकारी । जत कर्मज तत रेख सुधारी ॥ ततका मल हरि परसे परनारी । सुनो धर्मनि मैं कहौं विचारी ॥ नख उज्ज्वल होह गुंज चितेर । कलह कल्पना यमकर घेरा ॥ करपर लिखै विषमकी खानी । गुण औगुणकी लिखै निशानी॥ तिरछा रेख नारीकर नेहा । तासु नेह सुत सुता उरेहा ॥ माता पिता बन्धु भरतारा । विषमरेख यम लिखै विचारा॥ अवधि तीर दोउ तिरछा उरेहा । भक्ति भंडार विषमकर नेहा ॥ मीन पूछ भंडार सुधारी । सुख संपति बिभौ तन टारी ॥ नवो खण्ड यमरेख सुधारी । सुख संपति बिभौ तन टारी ॥ गुण अवगुणसबतबहि लिखावहु । युक्ति जानिकै हंस चेतावहु ॥ हंसा दासा तबही नर पावै । जब करताकी दशा मिटावै ॥ काल कर्म कालकी खानी । चाल चलावै नरकाग समानी ॥ काक कुबुद्धि तेज तनमाही । सतगुरु शब्द बतावहु ताही ॥ काक कुबुद्धि तजे कुटलाई । तब सतगुरुकै शरण समाई ॥ काक कुबुद्धि तत चाल मिटावै । तब निर्वान परमद पावै ॥ बुद्धि फेरि पलटावै बानी । सतगुरु शब्द गहे सहिदानी ॥ लोक लाज कुल दशा छुडावै । तब कौआते हंस कहावै ॥ यम रेखन की जाने बानी । सौ सतगुरु सोइ तत्त्व ज्ञानी ॥ रेखा विना न लेखा पावै । बिन लेखा नहिं गुरु कहावै ॥ सूकर खान गीध औतारा । बिनु यमरेख लखै नहिं पारा ॥ यमकी रेख सकल जब जाने । गुण अवगुण तबही पहिचाने॥ करपर होय चक्रकर थाना । शंख सीप गुरु भेद बखाना ॥ पाँचौं चक्र होय सम तूला । योगकला चतुरथ अस्थूला ॥