भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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( ८० )

बोधसागर

एकचक्र अथवा दुइ होई । कछु ज्ञानी कछु दुर्मति खोई ॥ तीनि होय तो होय उदासा । चार होय तो सूर्य प्रकाशा ॥ पाँचौ शंख होय करमाहा । दुख दारिद जान अवगाहा ॥ सीप होई तौ होय उदासा । शब्द प्रतीत शब्दकी आसा ॥ नखशिख रेख बिचारेहु जानी । तबहि सुधारेहु हंसकी खानी ॥ समय-नख शिख जानिके, तबहि सुधारेहु पान । भर्मभूत नहिं दर्शही, हंस होय निर्बान ॥

चौपाई

निर्खहु आदि अंत सहिदानी । गुण अवगुण देखहुँ बिलछानी ॥ कर्मजीव काल अधिकारा । कर्मके घर लेई अवतारा ॥ वरण भेद परिसै कुल जाती । रेखा लेख देखै उतपाती ॥ कर्मों काल कर्म वश होई । गुण अवगुण सबदेखिबिलोई ॥ उपजै चोर जुआरी झूँटा । कर्मों काल कर्म धरि लूटा ॥ कामीके घर कर्मों होई । कर्म रेख तब देख बिलोई ॥ कर्म खानि कायामहँ बासा । सुनै शब्द चित होई उदासा ॥ भर्म भूतकी गहै निसानी । पूजै शिला औ उलछै पानी ॥ मारु मारु मुख बानी भाखै । मन बशि जीव काल घर राखै ॥ नेत्र बिरह रस खुकुटी छीना । कबहुँ चंचल कबहुँ मलीना ॥ बालक होई पौनके साथी । मदमातै जस मैगल हाथी ॥ तिन जीवनकी दशा मिटावै । पाछे सत्य शब्द ससुझावै ॥ पद्म मुरक जाके तन होई । सो कर्मों जग जीवै लोई ॥ दया लगनकी परमित पावै । निर्मल हो सत्यलोक सिधावै ॥ नेत्र विशाल रक्तकी झाई । सुरति सनेह ज्ञान बहुताई ॥ जब तब चितमहँ संशय आवै । ज्ञान गम्यते मार बहावै ॥ ताकी निर्णय अगम सुभाऊ । पावै सत्य शब्दको दाऊ ॥