कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
( ८० )
बोधसागर
एकचक्र अथवा दुइ होई । कछु ज्ञानी कछु दुर्मति खोई ॥ तीनि होय तो होय उदासा । चार होय तो सूर्य प्रकाशा ॥ पाँचौ शंख होय करमाहा । दुख दारिद जान अवगाहा ॥ सीप होई तौ होय उदासा । शब्द प्रतीत शब्दकी आसा ॥ नखशिख रेख बिचारेहु जानी । तबहि सुधारेहु हंसकी खानी ॥ समय-नख शिख जानिके, तबहि सुधारेहु पान । भर्मभूत नहिं दर्शही, हंस होय निर्बान ॥
चौपाई
निर्खहु आदि अंत सहिदानी । गुण अवगुण देखहुँ बिलछानी ॥ कर्मजीव काल अधिकारा । कर्मके घर लेई अवतारा ॥ वरण भेद परिसै कुल जाती । रेखा लेख देखै उतपाती ॥ कर्मों काल कर्म वश होई । गुण अवगुण सबदेखिबिलोई ॥ उपजै चोर जुआरी झूँटा । कर्मों काल कर्म धरि लूटा ॥ कामीके घर कर्मों होई । कर्म रेख तब देख बिलोई ॥ कर्म खानि कायामहँ बासा । सुनै शब्द चित होई उदासा ॥ भर्म भूतकी गहै निसानी । पूजै शिला औ उलछै पानी ॥ मारु मारु मुख बानी भाखै । मन बशि जीव काल घर राखै ॥ नेत्र बिरह रस खुकुटी छीना । कबहुँ चंचल कबहुँ मलीना ॥ बालक होई पौनके साथी । मदमातै जस मैगल हाथी ॥ तिन जीवनकी दशा मिटावै । पाछे सत्य शब्द ससुझावै ॥ पद्म मुरक जाके तन होई । सो कर्मों जग जीवै लोई ॥ दया लगनकी परमित पावै । निर्मल हो सत्यलोक सिधावै ॥ नेत्र विशाल रक्तकी झाई । सुरति सनेह ज्ञान बहुताई ॥ जब तब चितमहँ संशय आवै । ज्ञान गम्यते मार बहावै ॥ ताकी निर्णय अगम सुभाऊ । पावै सत्य शब्दको दाऊ ॥
श्वसगुञ्जार
( ८१ )
काग बुद्धि मन दशा छुडावै । पावै शब्द लोक सो आवै ॥ स्वेत कुष्ठ मद गात मलीना । कर्म विश्व विषयी लौलीना ॥ जहद कुष्ठ मोती मनी भारी । धुन्द्य कुहेर बहिरी रक्तारी ॥ शून्य भाग्य दाग मतिमारी । फोकट कुष्ठ औ गंध पहारी ॥ रक्तविकार जहर धुनि फीका । अंग मलीन कर्मको लीका ॥ पाछिल कर्मज नरकी देहा । परखे सतगुरु शरण सनेहा ॥ तासु निशान परखिके काया । नेत्र गुञ्ज विषवाण बनाया ॥ कर्म निशान दशा पहिराया । तनविकार गुरुवचन नभाया ॥ तेहि जनि देहु मुक्ति बर बीरा । निश्चय काल करै बड पीरा ॥ पीरा सहे जीव शब्द न मानै । गुरु निन्दा निशिवासरजानै ॥ निन्दा करत जाइ यमदेशा । ज्ञान बुद्धि नाह गहै सदेशा ॥ गुरुकी दया जो मुखमहँ आनै । लोभ लहरि ममता मनसानै ॥ कबहिं न होहि ताहिकरकाजा । कितनो करै बुद्धिकर साजा ॥ गुरु निन्दा कुष्टी औतारा । परै रौर नरककी धारा ॥ सो सतगुरु जो होहि सयाना । ऐसे जीव कहँ देह न पाना ॥ पान लेइ अंतै बगडावै । स्वर्ग नर्क महँ ठाँव न पावै ॥ तनकी दुर्मति लहै न पारा । भजै राज नर्ककी धारा ॥ कर्मी खानि दहे नर पावै । पाछिल अवगुण संगहि आवै ॥ तेहि जनि देऊ शब्दसहिदानी । मानहु सत्य शब्दकै बानी ॥ धोखे आइ पान जो लेई । पाछै समुझि सिखावनि देई ॥ सुनत सिखावन हर्षित होई । ताहि देहु गुरुशब्द बिलोई ॥ गुरु की त्रास करै लौ लीना । सुनत सिखापन होइ अधीना ॥ मानै त्रास रहै लौ लाई । पावत पान करम कटि जाई ॥ उतपनि लगनजो साधहु धीरा । ताहि लगन सँग साजहुबीरा ॥ नाम पान पाँजी समुझायहु । सत्य शब्दकी रहनि बतायहु ॥
( ८२ )
बोधसागर
कामिनि कनक कलाकी फंदा । अरपै दुनौ शीश मनमंदा ॥ कामिनि अरपै कनक चुरावै । इहि विधि हंसलोकनहिंआवै ॥ कनक अरपि कुलभावदिसावै । वाजी दिखाइके कलाछिपावै ॥ कामिनि कनक करै सम तूला । पावै शब्द मुक्तिकर मूला ॥ चाल विना लागै बडि वारा । तामैं नहि है दोष हमारा ॥ चाल चलै कुलदशा मिटावै । भक्तिसार धरि लोक सिधावै ॥ कथनी कथै करनी नहिं जाने । ताते अवगुण सबै बखानै ॥ कथनी कथै लोक नहिं जाई । भात कहै नहिं भूख बुझाई ॥ पानी कहै प्यास नहिं जाई । कथनी कथै पाछे पछताई ॥ कथनी थोथर करनी सारा । कथनी कथि कथि हुये गँवारा ॥ कथनी कथि जो करनी करै । कहैं कबीर सो प्राणी तरे ॥
समय-करनी बोलै पारकी, करपै ले व्यवहार ।
करनी कर शब्दै गहै, उतरे भवजल पार ॥
चौपाई
महा शून्यके भीतर रहई । सत्यलोक की बातें कहई ॥ कहै अर्थ कथ करै विचारा । कहै कबीर सो शिष्य हमारा ॥ कथै आन करै जो आना । सो अब जानहु पशू समाना ॥ जैसा कहै करै पुनि तैसा । हैं हमहीं हमहीं सो ऐसा ॥ करनी करै कहै तब बाता । ताहि मिलै गुरु समरथदाता ॥ कथनी कथै गर्भ होय भारी । बिनु करनी सब यमकीबारी ॥
समय-करनी गर्भ निवारनी, मुक्ति सारथी सोय ।
कथनी कथि करनी करै, तो मुक्ताहल होय ॥
चौपाई
इहि विधि गहै शब्दकी आसा । निश वासर हम ताके पास ॥ अति अधीन करनी कर शूरा । करनी किये मिले गुरुपूग ॥ शूर होय करनी मन लावै । भक्ति करै जगबहुरि न आवै ॥
शवासयुञ्जार
( ८३ )
करनी शूरा कथनी सार । करनी केवल उत्तरे पार ॥ करनी करै शूरमा होई । कादर करनी करै न कोई ॥ शूरा होय तो करनी आवै । कादर होई सो बार लजावै ॥
समय-शूरा सोई सराहिये, अंग ना पहिरे लोह ।
लरै सकल वँद खोलिकै, मेटै तनकर मोह ॥
चौपाई
सदा अधीन रहै तनमाहीं । परिचे शब्द विचारे नाहीं ॥ रहे अधीन सतगुरुके आगे । निश्वासर सेवा चित लागे ॥ जो लगि नहीं अधीनता आवै । तब लगि सत्य शब्द ना पावै ॥
समय-नहीं दीन नहिं दीनता, नहीं सन्त सन्मान ।
ताधर यम डेरा किये, जीवतै भया मसान ॥
चौपाई
सदा अधीन रहै जो प्रानी । दीनेहु ताहि शब्द सहिदानी ॥ कुल अभिमान महानद भारी । भक्ति पन्थगहि ताहि सुधारी ॥ शब्द लेह कुलदशा न तोरे । तेहि यम विषम सरोवर बोरे ॥ भक्ति करै कुल कानि न खोवै । आवागोन गर्भ सुख गोवै ॥ जननी बेटी भैनी बाला । बहिन भयए ततक्षण काला ॥ इन्हते होइहि भक्तिकी हानी । लाज नदी महाँ बोरे आनी ॥ कुलकी राह बहारै लोही । कुलना तयारी छुती बिगोई ॥
समय-कुलकरनीके कारणे, हंसा गये बिगोय ।
तब काको कुल लाज है, जब चला चलाको होय ॥
चौपाई
कामिनि कनक कालकी खानी । काल कला धरि बोलै बानी ॥ इनते होय भक्ति कर नाशा । ताते बहुरि गर्भ महाँ बासा ॥ परदा प्रकट जबै ना होई । बोलै वचन मधुर धुन सोई ॥
( ८४ )
बोधसागर
परदै रहै लाजकी बैधी । परदा साथ कालकी सँधी ॥ गुरुसों कपट करी धन लीनी । सुरति निरति विनुकाल अधीनी ॥ कामिनी परदा सति सो ठानै । लाज लिये मुख बात न आनै ॥ गुरुके परदा बांचै नाही । बूढै विषम सरोवर माहीं ॥ गुरुसम मात पिता सो नाही । गुरु विन बूढि सरोवर माहीं ॥ गुरुसम मात पिता नहिं होई । मात पिता गुरु जानहु सोई ॥ समय-जे कामिनि परदै रहै, गुरुमुख सुनै न बात । ते कामिनि कुतिया भई, फिरै उधारै गात ॥
चौपाई
लोकलाज पति सबै बिचारा । लक्षण लक्ष्य सबै निरधारा ॥ जाको होई भक्तिकी आसा । सतगुरु चरण करै विसवासा ॥ तजै गर्भ जो निकसी आसा । पावै सतगुरु चरण निवासा ॥ यमको अन्त जानि जो पावै । भवसागर तब साधु कहावै ॥ सतगुरु चरण गहै चित जानी । मेट कुटिल कर्मकी खानी ॥ सन्त कहावै अन्त सम्झारी । चौदह काल चरण चित धारी ॥ चौदह यमकर सकल पसारा । सतगुरु शरण होई निरुयोरा ॥ चौरासी कर करम अपारा । विनु सतगुरु का करै उबारा ॥ गुरु करता गुरुदेव नरेशा । विनु गुरुगम सब भेद अनेशा ॥ गुरुसे दूसर और न कोई । जाते मुक्ति पदार्थ होई ॥
समय-गुरुकरता कर मानिये, रहिए शब्द सभाय ।
दर्शन कीजे बन्दगी, सुनै सुरति लगाय ॥
चौपाई
आगे मिलै बन्दगी कीजै । पाछे चरण कमल चित दीजै ॥ शब्द सुरति मिलि रहे समाई । ताप तपै नहिं सुरति समाई ॥ एकै देह एक अस्थूला । एकै भाव भक्ति कर मूला ॥
शवासुखार
( ८५ )
शिष्यके हिरदैं गुरुके वासा । शिष्य रहैं गुरुचरण निवासा ॥ गुरु शिष्यसों अन्तर नाहीं । मन है एक देह दुइ ताहीं ॥ शब्द स्वरूप गुरुकर वासा । सुरति स्वरूपशिष्यकीआसा ॥ समय-गुरु समाना शिष्य महँ, शिष्य लियाकरि नेह । विलगाये विलगैं नहीं, एक प्राण दुइ देह ॥
चौपाई
ताहिं गुरुसों सत्य जो कीजे । बाहर अंतैं चित्त ना दीजै ॥ जो गुरु शिष्य हृदय नहिं होई । तासों सत्य करै नहिं कोई ॥ गुरु बाहर शिष्य भीतर आवै । दुविधा धोखा काल तेहि लावै ॥ सत्य होय सो सत्यहिं जानै । गुरुकहँ राखि हृदयमहँ आने ॥ गुरु हृदये सो बसै निनारा । सत्य करत जाईं यमद्वारा ॥ गुरु शिष्यसों बाहर बसई । सत्य करत काल तेहि डसई ॥ गुरुकी मति अंतैं रहैं वासा । शिष्यकी मती गुरुके पास ॥ ऐसे गुरुसों सत्यजो करहीं । सेवा करत काल तेहि धरहीं ॥ शिष्य सयान गुरु अज्ञानी । धोखैं होइ दुनोंकी हानी ॥ गुरु शिष्यकी मति एकैं होई । सत्य करै तारै कुल दोई ॥ गुरुकी मति जो शिष्य न पावै । काज विसार चिंता मन लावै ॥ गुरुको भेद लखैं नहिं बानी । सत्य करै कुमती अज्ञानी ॥ नवका ऊपर बहुजीव चढावै । खेवा बिना पार नहिं पावै ॥ खेवनहार चीन्हि जब लेही । पाछै पाँव नउका पर देही ॥ खेवन हार चीन्हि नहिं पावै । नउका चढै सो मूर्ख कहावै ॥ सागर सुमति मुक्तिकी धारा । ममती न्याव ज्ञान कडहारा ॥ करै विवेक चोर औ साहू । बिना विवेक घाटलागुनकाहू ॥ चोर जानिके पाँव न देई । साधु जानिके पारहु जेई ॥ चोर साहूकर भाव बतावा । सागर नाव धार दिखलावा ॥
( ८६ )
बोधसागर
चोरके नाव चढ़ै जो कोई । सागर पार कबहुँ नहिं होई ॥ साहुकी नाव होइ असवारा । सागर उतरत लाग न वारा ॥ सागर पार मुक्ति कर वासा । जो गुरु मिलैतो करै निवासा ॥ घर घर गुरु घरहि घर चेला । लालच बाँचै फिरै अकेला ॥ जैसे श्वान कामबश धावै । तृष्णा बाँधै अंग लगावै ॥ तृष्णा मिटै गांठि जुरि जाई । पाछै शीश धुनि पछितार्ई ॥ एहि बिधि होइ दुवोजग भूटा । काल कलाधरि गहै न खूटा ॥ ऐसी सत्य करै जो कोई । धोखे जाय काल बसि होई ॥ गुरुकी करनी शिष्य जो पावै । तब सत्य करै सत्यलोक सिधवै ॥ समय-सत्य तो तासों कीजिये, जहवां मन पतियाय । ठाँव ठाँवकी सतीसों, कुलकलंक चढ़ि जाय ॥
चौपाई
अंकके मिटत कलंक मिटि जाई । अंकके रहत अकलंक न जाई ॥ अंक लिखा यम एहतन माहा । अंक मिटाइ देहु तेहि माहा ॥ नख शिख अंक लिखा यमराई । चौदह कला थाना बैठाई ॥ गुरुगमि शब्द जानि जो पावै । तब चौदह यमफन्द मिटावै ॥ एहि फन्दै सुर नर मुनि भूलै । देह धरी धरि सब जग झूलै ॥ चौदह काल विकार अन्याई । नर नारी घट रहै समाई ॥ भिन्न भिन्नके न्याय विलोवै । पारस निहार अन्तमुख गोवै ॥ प्रथम काल कामके अंगा । नख शिर व्यापै विषै भुजंगा ॥ चित्तभंग औ कुल व्यवहारा । लाज सनेह सकुच बटपारा ॥ आलस निद्रा रूप बरियारा । लालच लोभ मोह कर धारा ॥ विषय वास बसै बेकारा । इन्द्र चौदह मिलि भक्ति उजारा ॥ भक्ति प्रतीत शितल इन्हनासी । प्रेम बिगारि लगावहि फासी ॥ दया धीरज संतोष न आवै । सुमति सहज लै दूरि बहावै ॥
शवासगुञ्जार
( ८७ )
निर्भय ज्ञान विवेक गरासै । सुरति निरतिलै उपजत फाँसे ॥ सो सतगुरु जो होय सयाना । निर्भय लगन देह तिहि पाना ॥ निर्भय दशा सूर समुझावै । कूर कपट और भर्म बहावै ॥ निर्भय होइ भय तिलुका टूटा । नरनारी गुरु यमसों छूटा ॥ लगन सनेह गहै सहिदानी । उत्पति प्रलय विचारै खानी ॥ आदि अन्तकी लगन विचारै । सत्य दिशा धरि हंस उबारे ॥ चन्द सूर्य की गहै निशानी । आदि अन्त गुरुभेद बखानी ॥ चंद सनेह लेह औतारा । सोइ लगन गहि उत्तरै पारा ॥ ताहि चन्दकी नाकी पावै । सौ पाँजी गहि लोक सिधावै ॥ सूर सनेह विषम जम जोरी । प्रलय काल चौरासी डोरी ॥ सूर्य सनेह होइ सन्धारा । मारिके बहुरि लेह औतारा ॥ जत उपजै तत विनशै प्रानी । सूर्य सनेह सबनकी हानी ॥ चाँद सूर्य दोय गढके राजा । पौरि पगार बनौ दरवाजा ॥ अहुँठ हाथ गढ भीतर साजा । कपटभाव माया उपराजा ॥ दुइ दरवाजै बानो किवारा । एकपट रहै एक खुलै किवारा ॥ दोइ लगनकी राह संवारी । आवत जात लखै वैपारी ॥ आवत एक राह चलि आवै । फिर तेहि राह जान नहि पावै ॥ जौनी राह महलमहँ आवै । तहाँ स्वाति मुक्ता बरषावै ॥ तहाँ स्वाति मुक्ता बरषावै । फिर तेहि राय जाय जो खावै ॥ मुक्ता होय जग बहुरि न आवै । देवरूप होय जय जय पावै ॥ जब आवै तब खुलै किवारी । जात समय फिर मारत तारी ॥ जब वह द्वार जान नहि पावै । तारी मारि बहुरि तहाँ धावै ॥ जाने बिना होय मतिहीना । भूलि परै होय काल अधीना ॥ आवत जौन तुरे चढि आवै । सोइ तुरे यम फेरि छिपावै ॥ आने तुरे आन सो द्वारा । ताते पैर कालके धारा ॥
( ८८ )
बोधसागर
भूलै आदि तुरौ अस्थाना । ताते काल देहि बँधि खाना ॥ जौं वह तुरौ अन्त जीव पावै । खोलि कपाट बाहरको धावै ॥ आदि तुरौ चटि बाहर जाई । पाछै काल रहै खिसि आई ॥ आदि तुरौ विनु द्वार न पावै । बहुरि बहुरि चौरासी आवै ॥ धर्मदास बिनती अनुसारी । सतगुरु हो मैं तुम बलिहारी ॥ आदि अन्त प्रभु कहौ बुझाई । पकर न पावै काल कसाई ॥ अन्त करै पुनि गर्भमें बासा । काया धरे करें रहि बासा ॥ कायाते जब बाहेर जाई । ताकर भेद कहो समुझाई ॥ मैं आधीन हा मतिके थोरा । चरण टेकि प्रभुकरौ निहोरा ॥ आदि अन्त प्रभु कहौ बुझाई । सो सब जानौ चरण समाई ॥ वर्तमान भाषेहु उत्पानी । जानेहु आदि भेद सहिदानी ॥ अन्त अवस्था कहौ बखानी । जाते आगे होय न हानी ॥ जाहि द्वार प्रथमें चलि आवै । तुम प्रसाद शब्द लखि पावै ॥ कर्म अकर्म वरण कुल जाती । कहेउ बुझाय दिवस औराती ॥ कर्म अकर्म भाषहु बहु भावा । थमकर अन्त नजरि सब आवा ॥ कर्मरेख काल लखि राखा । गुरुप्रताप जानी सब शाखा ॥ गुणअवगुण सब कहि समुझायहु । गुरु शिष्यकर भाव बतायहु ॥ सो सब जानि गही सहिदानी । आदिभेद गुरु नाम निशानी ॥ नखशिख काल लिखा सहिदानी । सो सब जानिपरी मोहि बानी ॥ करम रेख काल लिखि दीन्हां । सो हम जानि दृष्टिमहँ लीन्हां ॥ गुण अवगुण दोऊकर भाऊ । परिखे काल करमकर भाऊ ॥ जहाँ २ काल लिखी सहिदानी । तू अदया है सब पहिचानी ॥ नखशिख रेखा काल बनावा । सो जो रेख जानि सब पावा ॥ आदि मध्य भाषहु सहिदानी । सो निशान जानी सब वानी ॥ जो भरि कहेउ सिखावन आनी । सो सब जानिकरौ दिलछानी ॥
श्रासगुप्कार
( ८९ )
कहेहु बुझाय मुक्तिके नाहा । रेखा परखि देहु ताहि वाहा ॥ गुणअवगुणसबमोहिलखिआवा । रेखा परखि तब पंथ चलावा ॥ भाषेहु आदि लक्षकी खानी । सो सब जानि गहो सहिदानी ॥ गुणअवगुणसबमोहिलखिआवा । परखौ लक्ष हंसकर भावा ॥ लक्ष्य अलक्ष्य दोऊ लखि लेहु । पाछै बाँह हंस कहि देहु ॥ नर नारी लक्षण देखि शरीरा । पाछै देहो मुक्तिके बीरा ॥ करपर रेखा लखौ सुभाऊ । शीश हृदय नाभी कर दाऊ ॥ कच्छ जंग औ मीन निशानी । लक्षण परखि चेतावो जानी ॥ चौदह काल विषमंकर दाऊ । शरण सनेह हंस मुक्ताऊ ॥ चौरासी कर बीज अंकुरा । संशय मेटि देहु मतिपूरा ॥ करमी जीवहि सूम पठायहु । निःकर्मा कह लोक पठायहु ॥ यह सब भेद विचारेहु जोरा । दगा देह नहि पावै चोरा ॥ उत्पति भेद सबै मैं पाया । वर्तमान हृदये महाँ आया ॥ चरण टेककी करौ निहोरा । अंत अवस्था भाषहु थोरा ॥ जादिन अंत अवस्था होई । तादिनकी गति कहौ बिलोई ॥ जादिन अंत अवस्था आवै । पाँजी भेद कहौ समुझावै ॥ जाते हंसहि काल न खाई । मुक्ति होइ सतलोकें जाई ॥ जैसे आवा गमन बतायहु । आदिमध्यसबकहि समुझायहु ॥ तैसे कहो अंतकी बानी । जाते न होय जीवकी हानी ॥ धर्मदास मैं तुम्हैं बुझाई । अंत दशाकर भेद बताई ॥ जा दिन हंस देह तजि जाई । ता दिनकी गति कहो बुझाई ॥ सोरह खाई दश दरवाजा । रविशशि संग जीव तहां गाजा ॥ आवा गौन करै दिन राती । गहौ निशान छोडि कुलजाती ॥ धर्मदास कुल जाति गँवावहु । तब तुम शुब्दहि पारख पावहु ॥ शशिके संग गर्भ जीव आवै । जलरंगतत्त्व चढि आनि समावै ॥
( ९० )
बोधसागर
ताहि संग रहै ठहराई । देह सनेह गहै यमराई ॥ काया परचै गहै निशानी । अंतकाल जीव करै न हानी ॥ जादिन अमल कालकी आवै । आगम भेद हंस जो पावै ॥ पावै भेद चित होय सयाना । गुरुते लेह सुधारस पाना ॥ काया परिचय आगम जानै । आदि अंत कह भेद बखानै ॥ प्रथमहि देह हमारी जो देखै । सो परिचय अवधी घट लेखै ॥ अंत देह हम यमकहैं दीन्हों । जानि गहै जीव ताकर चीन्हों ॥ देह हमारी निश दिन देखै । पूरण अटल सुफल तन लेखै ॥ जब देखै विनु शीशकी काया । तब जाने घट काल समाया ॥ छटए मास अवधि नियरावै । हमरि देह यम अछप छिपावै ॥ अपनी देह दिखावै काला । तब जीव जाने काल जंजाला ॥ हमरी देह लै शून्य समावै । अपनी देह प्रकट दिखलावै ॥ यमकी देह शीश विनु होई । तेहि देखत जीव जाइ विगोई ॥ हमरी देह बिमल बिस्तारा । काल देह बहुरंग अपारा ॥ जर्द श्याह औ नील सुरंगा । और रंग बहु कला तरंगा ॥ हमरी देह रंग विनु होई । नखशिख निर्मल देखै सोई ॥ जादिन आदि पुरुष निर्माया । तादिन देह वरण हम पाया ॥ सोइ देह धरि इहवों आए । कला अनंत जीव समुझाए ॥ देह धरे बहु लीला कीन्हों । ताते देह कालकर चीन्हों ॥ कालकला विष बान बनाया । सोइ विष नीर विषै दिखलाया ॥ जब हम चले पुरुषके पास । काया रही अघरही बासा ॥ काया त्यजी हम भए निनारा । सोई काया रही संसारा ॥ कायाकाल लीन्ह सहिदानी । अपने देश बसायसि आनी ॥ सो काया सबही दिखलाया । जो देखे सो थीर रहाया ॥ सो काया जो अघरहि देखै । शशि संपति सुखबिभौबिशेखै ॥
श्वसगुआर
( ९१ )
ता काया की यह सहिदानी । सो काया मम हाथ विकानी ॥ ऐसा काल भया अज्ञानी । हमसे लीन्हि सन्देह निसानी ॥ नरकी देह कालके हाथा । झाँई चले ताहिके साथा ॥ काया सरी गली इहाँ जाई । झाँई जानि गहै यमराई ॥ गहै काल औ लेखा लेई । धोखा लाइ नरक मई देई ॥ तेकाया कर करै विचारा । तीन लोक तजिहोए निन्यारा ॥ सहज सुन मह पकरै काला । झाँई साथ करै जझाला ॥ काया धरिके लज्जित कीन्हों । तेहि कायाकर माँगै चीन्हों ॥ देह धरे कीहिसि अति चारा । झाँई साथ जाए नहिं पारा ॥ सो झाँई जो इहइ बिबेखे । कंठ ध्यान धरिहम कह देखे ॥ अखंड मंडील मह काया रहई । ताकर भेद जानके गहई ॥ एह काया तजि ईहई वासा । झाँई तजी होयलोक निवासा ॥ सत्य शब्द जानै जो कोई । ताको आवा गौन न होई ॥ शब्द शब्द जो जीव न पावै । झाँइ साथ गर्भ फिरि आवै ॥ आवा गौन लखै सहिदानी । आदि अंतकी बूझे बानी ॥ गुण अवगुण झाँईके संगा । ताते काल करै मतिभंगा ॥ झाँई झमकि दिखावै गाता । आदि अंतकी बूझे वाता ॥ हमरी कयोंकर ध्यान लगावै । देखत ताहि परम सुख पावै ॥ जब वह काया काल चुरावै । काया परिचय आगम पावै ॥ काया परिचय भेद विचारै । नाम सुमिरिके हंस उबारै ॥ अंग अंगकी परिचय देखै । आगम जानि हरषितमन लेखै ॥ हर्षित रहै सदा दिलमाहीं । शोक मोह कछु व्यापै नाहीं ॥ कर औ शीश जानिके भावा । मास बरष कर आगमपावा ॥ आगम जानि गहै सहिदानी । बोलै सत्य शब्दकी बानी ॥ आगम जानि रहे लौ लाई । छूटत देह लोक तब जाई ॥
( ९२ )
बोधसागर
समाधान होइ आगम पावै । ता घट चोर न मूसन आवै ॥ लगन जानि जो पाँजी पावै । तत्त्व सनेह विलोक सिधायै ॥ आगमकी गति काया देखै । पर्वत नाम मंडल हित लेखै ॥ पर्वत पांच नाम अनुमाना । कहौ भेद सुन संत सुजाना ॥ पाँचौ पर्वत नजरि समावै । काया भेद नजरि तब आवै ॥ रवि लीला एक पर्वत भारी । चंद उनेह दूसर अधिकारी ॥ दुइके बीच सुमेर अनुमाना । देखत ताहि हंस निर्बाना ॥ चौथे मलय गिरि कैलासा । गोमत नाम पँचए परकासा ॥ पाँचौ पर्वत देखै सोई । गुरुगमि बुद्धि जाहि तन होई ॥ जब देखै तब कुशल शरीरा । विन देखै जानै तन पीरा ॥ रवि गिरि जादिन नजरेनआवै । तेजहि तन ना कष्ट जनावै ॥ चन्द्र शिखर जादिन नहि देखै । द्रव्यशोक कछु हानि विवेखै ॥ जादिन कैलास नजरेनहि आवै । मित्र हानि दुख खबरिजनावै ॥ गोमत पहार नजरि नहि आवै । काया कष्ट देश दुख पावै ॥ गिरि सुमेर जादिनहीं देखै । अन्तकाल तन घाव विशेषै ॥ रसना कान नजरि नहि आवै । मास सातमहँ काल चलावै ॥ जाकी रसना चूमक वासा । सो नहि देखै सदा निवासा ॥ पर्वत धवला नजरि नहि आवै । मास एक महँ मृत्यु जनावै ॥ तादिन काल चौकीअग आवै । ध्रुवमंडल नजरै नहि आवै ॥ सो सतगुरु जो होय सयाना । जैमुन जानि देह तेहि पाना ॥ जबतै काया आगम नहि पावै । तबतै अमी बीज नहि पावै ॥ काम बसी पावे जो ताही । बोरे विषम सरोवर माहीं ॥ काया श्वास चलै पर मेहा । काल वश्य होय छाँडे देहा ॥ पश्चिम लहरी जो गावै जानी । पांजी द्वार लखै सहिदानी ॥ चंद उगे सूर्य अथवै जबही । हंस सुजन तन यागै तबही ॥
शवासगुप्कार
( ९३ )
पूरी तत्त्व होय असवारा । पहुँचे सत्य लोक दरबारा ॥ सिंधु तेज होय तजै शरीरा । चले तेज चौराशी हीरा ॥ उत्पनि लगन देह तजि जाई । संकट गर्भ धरे नहीं आई ॥ अपनी काया आपु बिचारे । आपन आगम आपु सुधारे ॥ औरो आगम कहो बुझाई । जातें अवधि आनकी पाई ॥ गुरु आपु घट परखै जानी । तब पावै शिष्यकी सहिदानी ॥ तन परि आस परै जो प्राणी । तब निरखै ताकी सहिदानी ॥ झाँई झमकि जोत नहीं दरशै । काया कष्ट काल नहीं परशै ॥ गगन अवाज सुने नहीं बानी । कर पल्लवकी लखै निशानी ॥ मधीक जल्लौ दूना करई । पल्लौ सब पुहुमीमें धरई ॥ जेठा पल्लव ऊपर उठावै । तासु लहुरा उठि देखलावै ॥ निपल सहुरा पल्लौ उठि आवै । तासु जेठ वह अटल रहावै ॥ अटल रहै की यह सहिदानी । काया कष्ट होय नहीं हानी ॥ सो पल्लौ पुहुमीते डोले । देह तजै अस आगम बोले ॥ दरश भयावन वदन मलीना । लंपट बोलै काल अधीना ॥ ताही भूत ताहि दिखलावै । महा भयंकर मोट दरसावै ॥ कर पग शीतल सबै शरीरा । माथ तपै औ पायर बीरा ॥ औषध का गुण व्यापै नाही । निश्चय अन्तकाल है ताहीं ॥ नासिका नेह बासा नहीं आवै । थोथरी जिह्वा स्वाद न भावै ॥ हाथ पाँव पुहुमी मँहें मेलै । काँपे मेरु काल सँग खेलै ॥ छिन छिन माथ डुलावे सोई । जानहु अन्त काल पेहि होई ॥ आपन भाव दिखावै जबही । विषम कालाघट व्यापै तबही ॥ स्वपने शीश काटि कोई लेई । श्यामवरण कामिनि रति देई ॥ भइसा गदहा हाथी देखे । नाग श्वान औ भालु विशेषे ॥ झूरी बींद परै निशि सोई । चलै देह तजि सर्वस खोई ॥
नं. १० बोधसागर - ६
( ९४ )
बोधसागर
समय-गगन गरजै बिखुरी ना चमकैँ, तहां दुनो बन्द देईं। कहैं कबीर दिन पांच सातमें, हंस पयाना लेई ॥
चौपाई
काया परिचय भेद विचारैं । आपु तरे औरन कहैं तारैं ॥ सो सतगुरु जो होय सयाना । श्वासा नेह करै बन्धाना ॥ परिखै लगन तत्त्व निर्वाना । गुण अगुण सब करै बखाना ॥ निश्वासर चले सुरकी धारा । कायाकष्ट होइ अधिकारा ॥ तिथि अनुमान लखै सहिदानी । श्वासा सूर चले बलहानी ॥ बधिकके पहरे आपु उबारैं । चन्द सनेह भेद निरुवारैं ॥ श्वाशा सार गहै सहिदानी । शशिके घर महाँ सूर्य उगानी ॥ जेतिक श्वासा सूर्य उगाई । चन्दाके घर पीवे अघाई ॥ काया कष्टताप मिटि जाई । शील हंस होवै सुखदाई ॥ कालकी अवधि मिटावै जानी । समाधान होइ गहै निशानी ॥ तेज सुनरकी खा अतिचारा । ताते चले चन्द्रकी धारा ॥ महा अनन्द सफल तन होई । काल कला नहिं व्यापै सोई ॥ जब जब काल सतावे आनी । तब तब भेद करे बिल छानी ॥ साधैं लहरि समुद्र सनेही । तबसुख पावै यह जग देही ॥ साधन करै कहैं लौलीना । तत्त्व स्नेह होय नहिं छीना ॥ प्राण आत्माके गुण पावै । जो सतगुरु निज भेद बतावै ॥ परिचय तत्त्व साधना करई । धोखै प्राण न कबहुँ परई ॥ रूखा रूखा करै अहारा । सोई गहिहै भेद विस्तारा ॥ काम क्रोध तजि करै फकीरी । ज्ञान बुधि धारै तत्त्व धीरी ॥ वाद विवाद सबै विसरावे । दुविधा दूसर निकर न आवै ॥ श्वासा सार गहै गुंजारा । जाप जपै सतनाम पियारा ॥ अजपा जाप जपै सुखदाई । आवै न जाय रहै ठहराई ॥
श्वासगुञ्जार
( १५ )
चारि कमलकी परिचय जानै । गहै भेद निज तत्त्व बखानै ॥ फाहा रोपि करै निरुबारा । आदि अन्त सब करै सुधारा ॥ योजन चार करै बन्धाना । आसन मारि रहै निर्वाना ॥ चारि योजन खूटी विस्तारा । रूई फाहा जो करै सुधारा ॥ सुधा रूई नर नाटक माहीं । खूँटी ऊपर रोपै छाहीं ॥ बैठे आसन भूल सुधारी । देखै परिचय श्वास विचारी ॥ चले श्वास रतना गति नेहा । रवि शशि उदय विचारे देहा ॥ फाहा सनमुख बैठि रहावै । निरखे ताहि तत्त्व जब धावै ॥ पांचौ फाहा रोपै जानी । तत्त्व सनेह करै विलछानी ॥ रविके घर होय श्वासा आवै । योजन एक तीन तहां धावै ॥ एक योजन एक एकै विचारा । प्रलय प्रचंड तेजकी धारा ॥ ताहि लगनकी गहै निशानी । कछु सुखउपजैकछु होयहानी ॥ मूलकमल ताकर रहि बासा । तेजपुंज है बुद्धि प्रकाशा ॥ ताहि कमलकी देखे आशा । मूलकमल तब होय प्रकाशा ॥ तासु लगन लै साजहु बीरा । उपजै बुद्धि ज्ञान गंभीरा ॥ ताहि लगनकी पांजी पावै । तेजपंज मह बहुरि न आवै ॥ दूजै योजन तजि प्रकाशा । ताहि तत्त्व की देखै आशा ॥ निर्वृत कमल महाँ ताकर बासा । काया मध्य सुभर रहि बासा ॥ योजन तीन जो है विस्तारा । पृथ्वी तत्त्व जानकी धारा ॥ ताहां बसै पवन बल वीरा । जाहि पवन संग उपजै छीरा ॥ ताके संघ सँवारहु वीरा । निर्मल हंस होय गंभीरा ॥ श्वासा साथ पारस सहिदानी । विन रसनाकी बोले बानी ॥ दुसरी घडी चन्द्र सनेहा । गहो विचार देखिकै देहा ॥ ताकी श्वासा चल चोचण्डा । कहे कबीर मिटै दुखदण्डा ॥ झीनी श्वास होइ गुञ्जारा । चले प्रचंड बासुकी धारा ॥
( ९६ )
बोधसागर
दुई योजन पैज बिचारा । पौनविजय बल तहाँ सुधारा ॥ पुहुप कमलमहँ ताकर वासा । देहमध्य नाभी रहि वासा ॥ जाते होय क्षीर बंधाना । होइ खटाई स्वाद अमाना ॥ पुहुप कमल होइ लगन विचारै । पौन सनेह पान निरुवारै ॥ ताहि तत्त्व श्वासा चढि धावै । सोइ कमल जानि जो पावै ॥ जौन कमल तत्त्वकी धारा । तौन कमल नेव बिस्तारा ॥ जाहि तत्त्व सँग पान पठावै । ताहि कमलमहँ ले पहुँचावै ॥ आन कमलपर जीवकर बासा । आनते पान करै परकासा ॥ आन कमलमहँ पहुँचे याना । धोखे काल करे पछताना ॥ जाहि कमलपर जिवका बासा । तहाँ बयान कर रहु प्रकासा ॥ बालक की जिह्वा रहि बासा । सुभर कमलमहँ करै निवासा ॥ ताही लगन जीवके गहई । पावत पान काल न दहई ॥ संशय कमल देहु जनि पाना । नहिं तौ हंस होय अज्ञाना ॥ उपरहि पान लेइ यमराजा । संकट शिष्य गुरुकह लाजा ॥ सुरति कमल जीवकर बासा । ताहि कमलपर साथहु श्वासा ॥ पूरी तत्त्व चलै जब धारा । योजन चारि जाय चढिपारा ॥ सुरति कमलपर ताकर बासा । तहँवा पान करै परकासा ॥ पालता पौन ताहिके संगा । परसत ताहि होय नहिं भंगा ॥ पवन सजीवक करै अनुमाना । सो हंसहि लै जाय ठिकाना ॥
समय-चारि कमलमहँ चारि पौनहैं, चारिउ कमल अपीव ।
दाज पान सुधारिके, जाहि कमलपर जीव ॥
चतुरंगीकी लच्छ नहिं, तबहि सुधारहु पान ।
द्रादश कमल बिचारि हो, चौकाके अनुमान ॥
चौका चन्दन कीजियो, मलयागिरिको नाम ।
चारों कमल सुधारिकै, मध्य ताहिके धाम ॥
श्वासगुञ्जार
( १७ )
चौका चारि सुधारके, चारि कमल अस्थान । चारिउ पौन उरेहिके, देखो सुरति अमान ॥ सुरति सनेही पौन कहैं, सुमिरहु सुरति सुधार । चारिउ अंक सुधारिके, जल दल धरेउ सुधार ॥ प्रथमहि चौका कीजिये, चारि खूँट अनुमान । चौरासी द्रौप सुधारिहै, सत्य लोक सहिदान ॥ ऊपर पँखुरी द्रौपके, भीतर चौका चारि । द्वादशदल निर्वाण है, देखो सुरति बिचारि ॥ माया छत्र विस्तारहु, सती नाम विश्वास । द्वादशदल तहाँ सुरचिके, कीएहु प्रेम प्रकाश ॥ जापर बसे निरक्षर, ताहि तत्त्वको नाम । शब्दसुधारस खानि है, हम तुम तेहिके धाम ॥ शब्द सुरतिको नाम गहि, सुमिरै शब्द सुधार । तब सिंहासन पग धरै, रचै लोक विस्तार ॥
चौपाई
कदली दल आनेहु पनवारा । धरहु नारियर प्रेम सुधारा ॥ सनमुख कलशाले साजेउ जानी । बाती पांच धरेउ तहाँ आनी ॥ आसन लिखेहु लगनको नामा । भर्म्मभूत भाजै तजि धामा ॥ दहिने राखहु दल परवाना । मेटै जहर अभी धरि ध्याना ॥ निर्मल नीरकी देह दुहाई । जहर नीरकी दशा मिटाई ॥ आसन लेई लगनको नामा । लगन सनेह सुधरै धामा ॥ खरचा पांच धरेउ तिहि माहां । प्रकटे सत्य शब्दकी छाहां ॥ बहुबिधि बाससुगन्धमिलायहु । चौकाके दहिने धरवायहु ॥ ताके निकट शिला अस्थाना । रेखा रोपि करेहु बन्धाना ॥ सत्यशब्द ले रखै बनायहु । ताके ऊपर शिला बैठायहु ॥
( १८ )
बोधसागर
शिला ऊपर फिरि अंकसुधारैहु । शुक्तीकी श्वासा तहँ चारेहु ॥ ता ऊपर पुनि धरहु कपूरा । काल अंश होवै सब दूरा ॥ चौकाके बाएँ अस्थाना । आरति थार धरेहु सहिदाना ॥ आद्याके श्वासा सुख मूरी । ताको नाम सुधारहु पूरी ॥ अंक सुधारिके आसन कीन्हैहु । ताके ऊपर थार जु दीन्हैहु ॥ तिसरी श्वास करुणा मैं उचारहु । सुमिरणसारसत्यमुखभाखहु ॥ सुगन्ध सुपारी तापर राखहु । चौका कलश मध्य अस्थाना । धरहु मध्य धोती औ पाना ॥ नरियर मिष्ठानमध्यमें राखेहु । धोती पान बचनअभिलाषेहु ॥ इहिविधिकी यह सब विधिपूरा । सुमिरतके हम होव हजूरा ॥ लोक निशान पुरुषजो भाखा । सो हम गुप्त एको नहिं राखा ॥ सब विधि ज्ञान तुम्हें हमदीन्हाँ । अब हम लोक पयाना कीन्हाँ ॥ नारियर है ब्रह्मा कर माथा । सो हम दीन्ह तुम्हारे हाथा ॥ ताके मध्य जीव सहिदानी । मानतताहिकियहु विलछानी ॥ ज्योति कपूर कियेहु प्रसङ्गा । काल अंग परसतहोइ भङ्गा ॥ सतएँ श्वासा ताके सङ्गा । जाते यमकर मिटै तरंगा ॥ जैसी लक्ष्य जीवके पासा । हाथ नारियर नीकसुतासा ॥ कर्मौ जीव कर्मके बांधा । निर्णय भेद न जानहिं अन्धा ॥ अङ्ग छिपाइ करै जिव बोटा । ताकर होय नारियर खोटा ॥ निर्मल हँस होय सुखदाई । मोरत नारियर वास उडाई ॥ निर्मल अंकुर सेतपुर होई । शब्द सनेही प्रीतम सोई ॥ जैसी दशा जीवकी जानी । प्रकट होय जब नरियरभानी ॥ जेते लपट तासुकी काया । सो नरियरमें होय सुभाया ॥ नरियर एक होय जलरंगी । सतगुरु सत्यशब्द परसंगी ॥ पारसते ताकी उत्पानी । हँस दया धीर निकसी खानी ॥
श्वसगुञ्जार
( ११ )
कर्मी एक रोष निर्मावा । निरखत ताहि तत्त्व कर भावा॥ कपट सनेह कर्म सहिदानी । ताकर अङ्गसत्य करै हानी ॥ शब्द विचारि करेहु गुरुआई । पूरी तत्त्व लेहु सङ्ग लाई ॥ जेतिक लक्ष जीवकी काया । तेते पान साथ निर्माया ॥ रेखा गुञ्ज विचारेहु जानी । विषमतिछर करिहैजिम हानी ॥ गुरुकी रेखा जाहि पर होई । छत्र सोहावन पर्शे मिति सोई ॥ गुञ्ज औ छत्र शरन मुक्तायहु । ताहि पानपर अंक चढायहु ॥ सत्य शब्द पारस परसायहु । ॥ पारस मनि है तत्त्व सनेही । तासु लगन लै पान उरेही ॥ पावत पान हंस घर जाही । पौन सजीवक जावन नेहा । तत्त्व लगन लै सुरति सनेहा ॥ सत्य नाम मुक्तत सठिहारा । सो सहिदानी पान सुधारा ॥ छत्रके छल होई जेहि पाना । तापर अंक लिखै निर्बाना ॥ जाहि देहु हंसन कह खाहा । पान छत्र मणि दीजै ताहा ॥ निशदिन रहैं जो सुरति समानी । सो दीजै सीखन सहिदानी ॥ धर्मदास तुम जेठे भाई । हम लहुरे कीन्हा अधिकार्ई ॥ तुम्हरी वस्तु तुमहि कहैं दीन्हा । अब हम लोक पयाना कीन्हा ॥ जेते जीव आहि जगमाही । सो सब आवै तुम्हारे बाही ॥ तुम्हरे शिर जीवन कर भारा । आदि अन्तको तुम कडिहारा ॥ तुमरे हाथ जीवकर काजा । काल डसैं तब तुम कहैंलाजा ॥ वंश वयालिस कुलके राजा । ज्ञान गम्य सबै तेहि साजा ॥ उन्हके पास जीव जेते जावैं । सो सब सत्य लोक कह आवैं ॥ बंशके बंश छत्र मनिहारा । सोइ शब्द सुत वंश हमारा ॥ जेहिवां देइ सो लेकर जाई । काल डसैं नहि मोरि दुहाई ॥ बंशके बाँह जीव जत आवैं । यमकी नाक छेदि घर जावैं ॥