भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1703

शवासगुप्कार

( ९३ )

पूरी तत्त्व होय असवारा । पहुँचे सत्य लोक दरबारा ॥ सिंधु तेज होय तजै शरीरा । चले तेज चौराशी हीरा ॥ उत्पनि लगन देह तजि जाई । संकट गर्भ धरे नहीं आई ॥ अपनी काया आपु बिचारे । आपन आगम आपु सुधारे ॥ औरो आगम कहो बुझाई । जातें अवधि आनकी पाई ॥ गुरु आपु घट परखै जानी । तब पावै शिष्यकी सहिदानी ॥ तन परि आस परै जो प्राणी । तब निरखै ताकी सहिदानी ॥ झाँई झमकि जोत नहीं दरशै । काया कष्ट काल नहीं परशै ॥ गगन अवाज सुने नहीं बानी । कर पल्लवकी लखै निशानी ॥ मधीक जल्लौ दूना करई । पल्लौ सब पुहुमीमें धरई ॥ जेठा पल्लव ऊपर उठावै । तासु लहुरा उठि देखलावै ॥ निपल सहुरा पल्लौ उठि आवै । तासु जेठ वह अटल रहावै ॥ अटल रहै की यह सहिदानी । काया कष्ट होय नहीं हानी ॥ सो पल्लौ पुहुमीते डोले । देह तजै अस आगम बोले ॥ दरश भयावन वदन मलीना । लंपट बोलै काल अधीना ॥ ताही भूत ताहि दिखलावै । महा भयंकर मोट दरसावै ॥ कर पग शीतल सबै शरीरा । माथ तपै औ पायर बीरा ॥ औषध का गुण व्यापै नाही । निश्चय अन्तकाल है ताहीं ॥ नासिका नेह बासा नहीं आवै । थोथरी जिह्वा स्वाद न भावै ॥ हाथ पाँव पुहुमी मँहें मेलै । काँपे मेरु काल सँग खेलै ॥ छिन छिन माथ डुलावे सोई । जानहु अन्त काल पेहि होई ॥ आपन भाव दिखावै जबही । विषम कालाघट व्यापै तबही ॥ स्वपने शीश काटि कोई लेई । श्यामवरण कामिनि रति देई ॥ भइसा गदहा हाथी देखे । नाग श्वान औ भालु विशेषे ॥ झूरी बींद परै निशि सोई । चलै देह तजि सर्वस खोई ॥

नं. १० बोधसागर - ६