भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1704

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बोधसागर

समय-गगन गरजै बिखुरी ना चमकैँ, तहां दुनो बन्द देईं। कहैं कबीर दिन पांच सातमें, हंस पयाना लेई ॥

चौपाई

काया परिचय भेद विचारैं । आपु तरे औरन कहैं तारैं ॥ सो सतगुरु जो होय सयाना । श्वासा नेह करै बन्धाना ॥ परिखै लगन तत्त्व निर्वाना । गुण अगुण सब करै बखाना ॥ निश्वासर चले सुरकी धारा । कायाकष्ट होइ अधिकारा ॥ तिथि अनुमान लखै सहिदानी । श्वासा सूर चले बलहानी ॥ बधिकके पहरे आपु उबारैं । चन्द सनेह भेद निरुवारैं ॥ श्वाशा सार गहै सहिदानी । शशिके घर महाँ सूर्य उगानी ॥ जेतिक श्वासा सूर्य उगाई । चन्दाके घर पीवे अघाई ॥ काया कष्टताप मिटि जाई । शील हंस होवै सुखदाई ॥ कालकी अवधि मिटावै जानी । समाधान होइ गहै निशानी ॥ तेज सुनरकी खा अतिचारा । ताते चले चन्द्रकी धारा ॥ महा अनन्द सफल तन होई । काल कला नहिं व्यापै सोई ॥ जब जब काल सतावे आनी । तब तब भेद करे बिल छानी ॥ साधैं लहरि समुद्र सनेही । तबसुख पावै यह जग देही ॥ साधन करै कहैं लौलीना । तत्त्व स्नेह होय नहिं छीना ॥ प्राण आत्माके गुण पावै । जो सतगुरु निज भेद बतावै ॥ परिचय तत्त्व साधना करई । धोखै प्राण न कबहुँ परई ॥ रूखा रूखा करै अहारा । सोई गहिहै भेद विस्तारा ॥ काम क्रोध तजि करै फकीरी । ज्ञान बुधि धारै तत्त्व धीरी ॥ वाद विवाद सबै विसरावे । दुविधा दूसर निकर न आवै ॥ श्वासा सार गहै गुंजारा । जाप जपै सतनाम पियारा ॥ अजपा जाप जपै सुखदाई । आवै न जाय रहै ठहराई ॥