भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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आगनिगमबोध

( ५ )

महावाक्य ब्रह्माकी येही । तत्त्वमसी ताते कहि देही ॥ तत्त्व ईश्वर त्वं जीव कहाये । हौं पुनि स्मीको अर्थ बताये ॥ पश्चिम दिशतेहिअधिकपसारा । तीनों विधि ताको व्यवहारा ॥ चौथे वेद अथर्वण भाषी । उत्तर सुख ब्रह्माकी साषी ॥ तीनों वेदसे ताहि निकारा । तामें महावाक्य यह धारा ॥ अहं आत्मा ब्रह्म पुकारो । ताका ऐसो अर्थ विचारो ॥ अहं है मैं आत्मम है आपा । ब्रह्म नाम परमेश्वर थापा ॥ मेही हौं परमेश्वर आत्मम । उत्तरमें यहि वेद महात्मम ॥ चार युक्ति चहुँ वेदन माहीं । प्रथमें विधि जिहिकर्मकराही ॥ द्वितीये अर्थ बाद बतलाये । अस्तुति और कर्मफल गाये ॥ तृतिये मंत्र जो देव अराधू । चौथे नाम कथा शुचि साधू ॥ षट प्रकारकी विधि चहुँ वेदा । प्रथमें जग उत्पति निवेदा ॥ द्वितीये प्रलयको व्यौरा ठाना । तृतिये सुरसुनि चरितबखाना ॥ चौथे मन्वन्तर कथ दशचारो । पंचम सुरसुरपति व्यौहारो ॥ छठये धर्मशास्त्र विधिभाषा । तामें कथा भांति बहु राखा ॥ विद्या सकल जगत व्यौहारा । ज्ञान विधान अनेक प्रकारा ॥ ब्रह्मवाद भाषे विधि नाना । जाके पढे लाभ हो ज्ञाना ॥ चार वेद बुधि विद्या मूला । रचे शास्त्र षटतिहिअनुकूला ॥

इति

अथ षट् शास्त्रनको वर्णन चौपाई

अब षट्शास्त्रको वर्णन सुनिये । प्रथम न्याय ऋगवेदतेगुनिये ॥ गौतम न्याय कर्ताको करता । अस विचार ताके उर बरता ॥ सर्वे मई परमेश्वर जाना । एकते बहुरि अनेक बखाना ॥ उत्पति प्रलय कथा बखाने । नित्यानित्य बाद बहु ठाने ॥ द्वितियमीमांसाशास्त्रजोकहिया । यजुर्वेदते ताको गहिया ॥