कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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( ७ )
पुरुषते महातत्त्व प्रकटार्ह । पुनि हंकार इन्द्रीतत्त्व गार्ह ॥ प्रलयको घौस बहुरि जब आवै । इन्द्री तत्त्व सब तहाँ समावै ॥ जिहि क्रमसे जो दियौ देखाई । तिहि क्रम २ सब जाहि लुपाई ॥ पंचम शास्त्र पतंजल कहेऊ । वेद अथर्वणसे सो गहेऊ ॥ ऋषि पातंजलि ताहि बनाई । वर्णन सारुयशास्त्र सम तार्ह ॥ योग युक्ति तिहि माँह बखाना । ज्ञान द्वारते युक्ति प्रमाना ॥ छठे शास्त्र वैशेषिक भाये । मुनि कणाद कर्ता कहलाये ॥ वेद अथर्वणते गहि लीना । यह षट्शास्त्रको वर्णन कीना ॥
इति श्री षट्शास्त्र
अथ चार उपवेद वर्णन
दोहा-आयुर्वेद धनुर्वेद पुनि, गन्धर्ववेद बखान ।
अथर्वेद ये चार हैं, तिनकी निर्णय ठान ॥
चौपाई
प्रथमे आयुर्वेद करतारा । ब्रह्मा प्रजापति अश्वनीकुमारा ॥ धन्वन्तरि आदिक रच ताही । कामशास्त्र वेदादिक जाही ॥ द्वितिये धनुर्वेदके करता । विश्वामित्र नाम सो धरता ॥ ब्रह्मा परजापति से जोई । विश्वामित्र सिखे गुन सोई ॥ सकल युक्ति शिष कीन प्रचारा । परजा पालन कै व्यौहारा ॥ शास्त्र प्रहारकि युक्ति है तामें । युद्धकरनकी बिधि वह वामें ॥ आयुध दोय प्रकारके मुक्ता । एक है मुक्त अरु द्वितिय अमुक्ता ॥ तृतिये मुक्तामुक्त कहाऊ । यंत्र मुक्त चौथेको नाऊ ॥ हाथसे जो चक्रादि चलाये । ताको नाम मुक्त बतलाये ॥ तरवार आदि अमुक्त बखाना । बरछी मुक्तामुक्त प्रमाना ॥ बहुरि तीर आदिक अरु गोली । यंत्र मुक्त तिनको कहि बोली ॥ मुक्त आयुधको अस्त्र कहीजै । अरु अमुक्तको शास्त्र भनीजै ॥