कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( १२ )
बोधसागर
यकदेशी अनुभव अरु ज्ञाना । सो कछु कामको नहीं बखाना ॥ ब्रह्म सर्व देशी कह सोई । साक्षी सर्व अकर्ता होई ॥ सब करतूत प्रकृती ठाना । योग समाध साधना नाना ॥ उत्तपति अस्थित परलय कर्मा । सो सबही प्रकृतके धर्मा ॥ पांचों तत्त्व पचीस प्रकृती । चारों देह आदि सब नास्ती ॥ ईश्वरको जो जाननहारा । सर्वसाक्षि सो आस्ति पुकारा ॥ ये सब अनितमें नितको आस्ती । योग आदि सब मिथ्या नास्ती ॥ झूठे वेदान्ती ऐसे कहई । मिथ्यावाद सकल यह अहई ॥ एक अखण्ड ब्रह्म है जोई । तामें अस्ति नास्ति नहिं कोई ॥ आप आप सम्पूर्ण व्यापा । अमकरी त्रिपुटी तामें थापा ॥ ध्याता ध्यान घेय नहिं कोई । ज्ञाता ज्ञान होय नहिं जोई ॥ ब्रह्म अखण्ड अद्वैत एकरस । ताते द्वैत भाष भाषे कस ॥ नित्य नित्य समाधि है जोई । तामें सो सम्भवै न कोई ॥ देखन अरु देखनमें आये । देखनहार ब्रह्म बतलाये ॥ ब्रह्मते इतर और न कोई । नास्ति और सब मिथ्या होई ॥
सोरठा-वाद करे इमि सोय, चार वेद षट् शास्त्र मिलि ।
भेद न पावे कोय, अगम अपार अकथ कथा ॥
सत्य कबीर वचन
सारखी-वेद हमारा भेद है, हम वेदनके माहिं ।
जौन भेदमें मैं बसो, वेदौ जानत नाहिं ॥
अथ विष्णुके चौवीस अवतारको-वर्णन
दोहा-मीन कूर्म बाराह कह, नरहरि बामन बंक ।
परशुराम रघुराम कह, कृष्ण बुद्ध निष्कलंक ॥
व्यासकपिल हयग्रीव पृथु, यज्ञत्रहपभ सनकादि ।
दत्त मन्वतर बद्धिपति, धानन्तर इंसादि ॥