कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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( ११ )
ताते यह निश्चय करि मानो । कर्म कालकी वश में जानो ॥ कालहि ब्रह्म और नहिं कोई । काल पाय अज हरि हर होई ॥ काल पाय पुनि सो बिनसाही । उतपति प्रलयकाल वश आही ॥ कालहि ते सुख दुख लहंता । काल स्वतन्त्र कर्म परतन्ता ॥ जब चाहे क्रम कर नर लोई । काल किये ते कवहु न होई ॥ ताते काल सत्य करि मानी । कर्म असत्य वैशेषिक बानी ॥ तृतीय न्याय निज मत अर्थाई । काल है छीन छीन है जाई ॥ घटि बटि जाय कालकी बाते । काल कर्म नास्ती दोष ताते ॥ अस्ति एक परमात्म आही । तीन काल आवै अरु जाही ॥ निजु बश ईश्वर कालको धरई । जब जस चाहे तब तस करई ॥ ग्रीषम वर्षा काल बनावै । वर्षाको ग्रीषम दिखलावै ॥ चाहे रंक् रावकरि द्वारी । भूपतिको पुनि करे भिखारी ॥ सकल सूत्रधर ईश्वर ऐसे । नाचे जग कठपुतली जैसे ॥ ताते परमेश्वर है अस्ती । काल वो कर्म सुभाव है नास्ती ॥ चौथे पतञ्जलि कह यह लेखा । कहो कहां तुम ईश्वर देखा ॥ तुम नहिं जौ ईश्वर लखिपाई । तौ पुनि कैसे ताहि बताई ॥ कैसो ईश्वर होइ रे भाई । बिन देखे कह कहो बुझाई ॥ ईश्वर वहां सो कैसे जाना । बिनु अनुभव भाखे अनुमाना ॥ पीतर पाथर प्रथमा पूजो । अनुमानहिते मनमें सूजो ॥ यह सब झूठ भरमको फन्दा । आत्म शुद्ध सच्चिदानन्दा ॥ सो हम जोग मार्ग ते जाना । तुमको नहिं कहु अनुभवज्ञाना ॥ तुम प्रतिमा पूजो यहि लेखे । हम ब्रह्मांड पिंडमें देखे ॥ तुम हो झूठो हम हैं सांचे । ईश्वरकी अनभौ तुम काचे ॥ ताते योग सत्करि जानो । और सकल झूठा करि मानो ॥ पञ्चम सांख्यपती अस बोलो । तुम सब मिथ्या भ्रमयुत डोलो ॥