कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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( १५ )
अथ सप्त पातालके नाम
दोहा—अतल वितल सुतलोक ही, फेरि तलातल होय । महातला पाताल पुनि, अंत रसातल जोय ॥
इति सप्त पाताल
अथ नौघरोके नाम चौपाई
प्रथम भूमि भूलोक बखानी । दूजे भुवरलोक है पानी ॥ स्वर्गलोक पुनि अग्निको घेरा । पितर लोक पुनि वायू टेरा ॥ पंचम शून्य लोक आकाशा । अन्तर लोक हँकार प्रकाशा ॥ सप्तम सत्यलोक मह तचू । अष्टम लोका लोक कहचू ॥ ॐ शब्द तहवां ते होई । मायाको घेरा है सोई ॥ ताके परे नामै अस्थाना । शुद्ध स्वरूप निरंजन जाना ॥ शब्द निरञ्जन ते उत पानी । ताते तब माया प्रकटानी ॥ मायाते महतत्त्व पसारा । महा तत्त्व से भा हँकारा ॥ अहँकार आकाश उपायो । पुनि आकाश वायू प्रकटायो ॥ वायुते अग्नि अग्निते पानी । ताते यह भूलोक बखानी ॥
इति
अथ सप्तद्वीप और ब्रह्मांडको वर्णन
दोहा—प्रथमै जम्बूद्वीप कह, शाकद्वीप कर फेर । कौंच कुशा शलमरूप पुनि, पुक्षो पुष्कर टेर ॥
चौपाई
ताते परे योजन दश कोरी । कंचनकी पृथ्वी लै जोरी ॥ परम प्रकाश मान महि सोई । तासु परे परवत यक होई ॥ लोकालोक नाम सो भाषा । महाशून्य बन तापर राखा ॥ उग्र उद्दि यक ताते आगे । बहुरि अग्नि ताते पर लागे ॥