कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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बोधसागर
पौन दसगुना पुनि पर ताही । तासु परे दशगुन नभ आही ॥ तासु परे योजन यक लाखा । सघन कंथ ब्रह्मण्डको राखा ॥
इति समद्वीप
अथ अष्टवसुओंके नाम
दोहा-प्रथम द्रौन पुनि प्रानकह, ध्रू अर्क अग्नि प्रमान । दोषा वसू विभावसू, अष्ट वसू ये जान ॥
इति अष्ट वसु
अथ चार युगोंकी आयुस्थितिर्वर्णन चौपाई
चारों युगकर लेखा प्रमाना । कृत त्रेता द्वापर कलि जाना ॥ सतयुगकी आयू इमि कहसे । सत्रह लक्ष अठाइस सहसे ॥ त्रेताकी आयू पुनि भाषा । छानवे सहस्र अरु बारहलाखा ॥ आठ लक्ष चौसठ हजारा । द्वापर आयू करो विचारा ॥ बत्तिस सहस्र चार लक्ष कहिये । कलियुगको यह लेखा लहिये ॥ चारों युग यक ठौर गहीजै । एक महायुग तासु कहीजै ॥ एक सहस्र महा युग होई । कल्प एक मुनि कहिये सोई ॥ चौद मन्वंतर कल्पमें होई । कल्प एक ब्रह्मादिक सोई ॥ ऐसे दिनको लेखा लीये । एकसौ वर्ष लौ ब्रह्मा जीये ॥ एक सहस्र ब्रह्मा है बीते । तब एक घडी विष्णुकी रीते ॥ ताके दिनते करि पुनि लेखो । निजुसौ वर्षविष्णु थित देखो ॥ जबदशलक्ष विष्णु बित जाही । घडी एक तब रुद्र सिराही ॥ ताहि वर्ष पुनि लेखा कीये । निजु सौ वर्ष रुद्र पुनि जीये ॥ ग्यारह रुद्र जो उगि खपिजाना । रमा शिवा यक घडी प्रमाना ॥ निजु सौ वर्ष कि आयू पाई । सहस्रशिवा जबउगिखपजाई ॥ तब मायाको पलभर होई । न्यौरा वेद बखाने सोई ॥ यह लेखा यक भयो प्रमाना । प्रभु माया गति काडुन जाना ॥