भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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आगमनिगमबोध

( १७ )

चहुँ युगमें आयू नर केरी । लखदश सहस्र सहस्र सत केरी॥ याहूको नहिं कीन प्रमाना । आयू थित हैं विविधि विधाना॥

इति

अथ चौदह रत्नके नाम

दोहा-श्रीमणि रंभा वारुणी, अमी शंख गजराज । कल्पद्रुम शशि घेनु धन, धन्वन्तर विष बाज॥

इति चौदह रत्न

अथ पंचप्रकारके यज्ञ वर्णन

दोहा-अभ्यागत आदर कहै, बहुरि वेदको पाठ । आहुत भूतन यज्ञ कह, पितर यज्ञकी ठाट ॥

इति पंचप्रकार यज्ञ

अथ कर्म उपासना और ज्ञानको वर्णन—चौपाई

मारग तीन वेद जो भाषा । प्रथमहि कर्म कांडको शाषा ॥ पुनि उपासना ज्ञान कहाही । तिहुके तीन देवतन माही ॥ क्रम इन्द्री क्रम कांड गहाये । अन्तःकरण उपासक गाये ॥ ज्ञान इन्द्री सो ज्ञान गहंता । यह तिहु देवको भेव भनंता ॥ सूरख कहाँ उपासक होई । कर्म ज्ञान यामें नहिं कोई ॥ कर्म उपासना ज्ञान जो तीनी । चौदह इन्द्रीते कहि दीनी ॥ जबलो नहिं तिहुकोसम ताई । कोई कर्म शुद्ध नहिं पाई ॥ एक हाथ जो चोरी करई । देह समस्त बन्दिमें परई ॥ कर्म उपासना ज्ञान गहाई । भली भांति तिहुमेल मिलाई ॥ हट हौ गहे मुक्ति जिव पावैं । अब कर्मनको भेद बतावैं ॥ जो कोई पित्रकिमुक्तिकि हेता । तन मन धन अपने सब देता ॥ पितृ लोकमें सो चलिजाई । पुनि जो जैसो कर्म कराई ॥ कोई गंधर्वके लोक समाही । देवकभी परजा पति पाही ॥