कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( १८ )
बोधसागर
हिरण्य गर्भं गुरु पंडित जासी । यज्ञ करंत चन्द्रपुर वासी ॥ जीव आतमाको गुण येही । जेहि औसर जैसी गह देही ॥ भ्रम भयते संयुक्त जो होई । भ्रमही रूप बनावै सोई ॥ ज्ञान बुद्धि जब होय संघट्टा । ज्ञान रूप हो भ्रम भय कट्टा ॥ पुण्य पाप कर्मनते जूटा । बँधा जीव ग्रह ताही खूटा ॥ तिहि अनुसार कर्म सब करई । जैसो कर्म धाम तस धरई ॥ जैसी देह कर्म कर तैसा । सदा आत्माको गुण ऐसा ॥ जीव वासनाते नित पूरन । जस वासना ताहिते जूरन ॥ मनमें यथा मनोरथ होई । अंतकाल फल पावै सोई ॥ रही लगी जह जीवकी आशा । सूक्ष्म तन धरि तहकरबासा ॥ पुत्र कामना जाको होई । पुत्र देह धरि प्रकटै सोई ॥ पुत्रको ऐसो उचित बतावै । पिताकि मन कामना पुरावै ॥ पिता मनोर्थ जो सुतन पुरावै । तौ पितु बहुरि देह धरि आवै ॥ पितु अपने मनोर्थ को हेरे । धरे देह निज इच्छा प्रेरे ॥ ज्ञान अरु परमारथ के कारण । जीव कीन मानुष वपु धारण ॥ अबलों कथा प्रसंग जो रहेऊ । बंधकामना व्यौरा कहेऊ ॥ वर्णन अब कीजे कछु तिनको । रहित कामना मन है जिनको ॥ सकल कामनाको जो त्यागे । कारण द्वै तिहि माह विभागे ॥ होय कामना जो कछु हीये । फेर न चाह भोगिभल लीये ॥ द्वितिये ज्ञानदृष्टि मनकामा । तुच्छ दृष्टि देवै सब तामा ॥ मिथ्या सकल जो कछु दरशाई । जानि अनित्य न नेह लगाई ॥ आतम ज्ञान सर्व पर जानी । ताते सर्व लाभको मानी ॥ आतमते सब कुछ प्रकटाना । ताहि लाभ सब लाभ लहाना ॥ सकल कामना जो कोइ त्यागे । आतम ज्ञान तासु उरजागे ॥ जो कछु चितमें चाह चपेरे । तौ बीन तन यह जिव हेरे ॥