कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंआगमनिगमबोध
( १९ )
जाके हृदय कामना नाहीं । ब्रह्म स्वरूप कहीजै ताहीं ॥ रहित मनोरथ अमर है सोई । मयनहार कातिक जिव होई ॥
छन्द-सब चाह उत्तरते दाह भै तब सुक्ति याकी सन्ध है । जब लोन करिये बामना तिहि कामना जिव अन्ध है ॥ यहि लोककी वहि लोककी तिहि शोकमें यह बन्ध है । चाहे चमारी चूहरी तिहि फूहरी डुरगन्ध है ॥ जिमि सर्प त्यागे केखुली इमि चाह उत्तरे त्यागिये । तजिताहि फणि फिरि चाह नहि यौ पुनि ना तामें पागिये ॥ मद मार विषय बिकार डारके रूपते अनुरागिये । दलमलितखलदलललितज्ञानते ब्रह्महो जिय जागिये ॥
जो निष्काम कर्मको करही । तिनको कबहुँ न घाटा परही ॥ चाह न कर्म पलनते जाही । निश्चय अधिक फल कर्मते ताही ॥ नफाहेतु जो कर्मको गहते । घाटा हू पुनि सोई सहते ॥ जिनको फलनकी इच्छा नाहीं । जो प्रभुकृपासे तिहि मिल जाही ॥ सो फल नफामें लेख लगाये । ऐसी समुझ सुक्तिपद पाये ॥ जप तप तीर्थार्थदिक व्रत दाना । सहित मनोरथ जाने ठाना ॥ इनको फल जो कोई चाही । सो जिव असुर लोकमें जाही ॥ कर्मके बन्धनमें सो बांधा । बूथा सो निज इन्द्रीको साधा ॥ बादिसो आपनो ग्रह सुख खोई । अन्धकारमें अधिक बिगोई ॥ जो कोई है आतम ज्ञानी । सर्वमई सो आपुहि जानी ॥ पुण्य पाप सुख दुःख सब जोई । नर्क स्वर्ग आदिक जो होई ॥ ब्रह्मा विष्णु रुद्र अभिमानी । सो सब अपनी देह बखानी ॥ भ्रम रज बन्धा जीव अज्ञानी । सो टूटे आतम जब जानी ॥ जिनमें नहि साधूकी करनी । बचन बनाय ज्ञान बहुबरनी ॥