कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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बोधसागर
साधू नहीं भाँड है सोई । ताते अधिक न शठ है कोई ॥ तिनते भलो जानिये सोऊ । आगम फल आसा कर जोऊ॥ कर्म उपासना ज्ञान जो होई । भिन्न भिन्न तिहि फल कर जोई॥ ज्ञानते इतमें भेद बिचारा । तिनको फलहुबतावज्योन्यारा॥ सो अक्षर अभ्यासी अहई । ताहि न अर्थी पण्डित कहई॥ कर्म उपासना ज्ञान जो तीनी । एकै फल तीनते कहि दीनी ॥ सनबन्धी यक दूजा हेरो । ज्ञानको अर्थ जाननो टेरो ॥ कर्मको मर्म न हृदय गहाया । नहीं उपास्य गुणको लखिपाया॥ कर्म उपासना झूठे तिनके । कछु व्योरा हियमें नहि जिनके॥ कर्मको अर्थ याहि बिधि कहना । चाल चलन सुकर्म सब गहना ॥ जाके हृदय हो उत्तम ज्ञाना । करनी तासु विरुद्ध लखाना ॥ ताहि ज्ञानते गुन कछु नाही । कर्म उपासना वृथा कराही ॥ साची प्रीत उपासना सोई । होय एकता रहै न दोई ॥ जबलो नहीं यह गुन दृश्याई । कर्म उपासना ज्ञान वृथाई ॥ जो कोई विषयनको त्यागे । ताके हृदय ज्ञान यह जागे ॥ ज्ञान दृष्टि करि तब सो जाना । कर्मापासन योगो ज्ञाना ॥ चारों चार तत्त्वसे कहिये । रचना सकल सृष्टितिहि लहिये ॥ चारों मिश्रित सम सुख दाई । घटि बटि भये न सुख कोइ पाई ॥ बिना ज्ञान करा कर्म जो लोगू । कर्मापासन अथवा योगू ॥ सोनिशि दिन जौ निजुतन कसही । आशा तृष्णा युति बुधि नशही ॥ कर्मापासन योग समाधा । ज्ञान सहित जो कोई साधा ॥ सो सब विषम अविद्या जानी । जीयत जीवन मुक्त सो प्रानी ॥ मुये विदेह मुक्ति लह सोई । जिनके हृदय ज्ञान अस होई ॥ मरण काल जिहि औसर आवै । देहकि नेह जीवको छावै ॥ तनकी प्रीतिसे दुःख बड माने । काहूको नहीं तब पहिचाने ॥