कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंआगमनिगमबोध
( २१ )
जीव आत्मा यह तिहि बेले । इन्द्रिको निजु संग सकेले ॥ सब इंद्री तजि निज खुटे । जाय जीव आतम ते जूटे ॥ उरमह दिसे बुद्धिके रूपा । मूर्ति एक तामें सब गुपा ॥ तनधारि तन आपुहि जाना । इन्द्रि सकल रहित भे ज्ञाना ॥ दृष्टि तब खनते हिलही । सूक्ष्म तन गति सूरजते मिलही ॥ सूर्यन पृथ्वी माह समाई । रसना स्वाद वरुणा में जाई ॥ वाक् अग्निमें पौन समीरा । दिशा सौन मन शशिके तीरा ॥ भूताकाश बुद्धिकर थाना । जिव सब संगले करे पयाना ॥ जो जिव भले कर्मको करता । दृगसार बाहर पग धरता ॥ सूर्य माह सब जाय समाई । इमि सब इंद्री राह गहाई ॥ भले कर्म जिनके अधिकार्ई । ब्रह्मरंध्र कटि बाहर आई ॥ जैसो कर्म करे जो कोई । तैसी राह गहै पुनि सोई ॥ जिवको बासा तनते छूटे । आवा गौन श्वासको टूटे ॥ जड समान देही रहि जाई । जीव नवीन कलेवर पाई ॥ अहं बोलिके जीव सिधारै । हौं मैं प्रथमहि शब्द उचारै ॥ सहित कर्म जिव करे पयाना । तजि तनथूलसौलिंग लहाना ॥ निज कर्मनके प्रेरित येही । सदा नवीन धरे जिव देही ॥ जिमियक भूषण भंजि सोनारा । निज इच्छाते और संबारा ॥ तैसे देह जीव यह गहई । पुनि पुनि गहै तजै श्रुतिगहई ॥ पूरन काल जीवको बाजा । उर्ध्व गमनको करै समाजा ॥ अधर लोक दोड लोकके बीचे । कर्म तहां जब जिवको खींचे ॥ ज्यों जाग्रत स्वप्नने भरमाई । अपने कर्मको फल इमि पाई ॥ सरगुन गहिकर सुरनमें बासा । असुरको गुनगहिदुःखबहुँपासा ॥ प्राण स्वप्नमें देखत सोई । जाग्रित माह बिचारे जोई ॥ ताहि समान गहैं सो देहा । दुख सुखको है कारण येहा ॥