कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( २२ )
बोधसागर
स्वप्न समान नर्क अरु स्वर्गा । इच्छारहित अहित अपवर्गा ॥ ऐसे निज अनुमान गहाये । नर्क स्वर्ग अरुमध्य गहाये ॥ मारग मुक्ति कहावे सोई । सूर्य मंडल बेधे जोई ॥ ब्रह्म लोक की मारग पाई । ताहि संग निज बास गहाई ॥ जिमि दीपक घटज्योति अपारा । जीव आतमा रूप सोधारा ॥ नसाजाल आतमकी ज्योती । सो बहुरंग ढंग की होती ॥ श्वेत हरित दुति प्रीती देखाये । भूरा रंग तासु प्रगटाये ॥ नसन प्रकाश तासु उर होई । मुक्त होत पहुँचे जो कोई ॥ सुषुम्णामें मिलि एकसौ नारी । उत्तम मध्यम लोक सिधारी ॥ केती नशा अधोमुख आहीं । अधोगती को सो ले जाहीं ॥ गहै गैल तिहि मारग जबहीं । अधोगती जिव पहुँचे तबहीं ॥ यहि विधि नर्क स्वर्ग जिव जाही । थित प्रमाण दुखसुखलह ताही ॥ पूरण जब करार हो आवै । तब मृत मंडल वासा पावै ॥ कर्मके बंधन जिव तन धरही । चार खानिमें दुख सुख भरही ॥ स्वेदज जरायुग अंडज पिंडज । नाना बरन रूप निजु २ सज ॥ अंतमें जीव सुरति रह जाही । प्रगट होय सो धरितन ताही ॥
इति
अथ जीवको योनिप्रवेशवर्णन-चौपाई
योनि प्रवेश जीव जब करता । कोई ध्रुत्र मारग पग धरता ॥ देह वानमें जाय समाई । वीर्य रूप है सो प्रगटाई ॥ मेघ बून्द मारग ते कोई । हो रसरूप औषधि सोई ॥ तेहि भोगीके वीर्य मैझारा । केते प्राण वायुके द्वारा ॥ पौन पंथ गहि केते समाई । केते धान खेत प्रवेशाई ॥ चावल आदिक अन्नमें रहई । नाना वर्ण रूप सो गहई ॥ केते गगनमें स्थित गहाई । चंद्र किण्मैं रहे समाई ॥