भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

पृष्ठ 1746, कुल 2136 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1746

( २४ )

बोधसागर

शाखा तिरदेवा बने पाती संसारा हो । ब्रह्मा वेद सही किया शिव योग पसारा हो ॥ विष्णु माया उत्पति किया उरला न्यौहारा हो । तीन लोक दशहु दिशा रोकै यमद्वारा हो ॥ ज्योतिस्वरूपी हाकिमा जिन अमल पसारो हो । अमल मिटावो ताहिको पठावो भवपारा हो ॥ कहै कबीर तिहि अमर करो निज होय हमारा हो ।

चौपाई

यजुरवेद भाषै भल ढंगा ।जिमि आतम परमात्मा बिहंगा॥ बहुरि यकादश गीता कहई ।जैसे फाँस जीव गल गहई ॥ क्रामिक जीव बँधा बहु बन्धन ।फँसा आशा तृष्णाके धंदन ॥ साखी-माया मुई न मन मुवा, मरि मरि गई शरीर । आशा तृष्णा ना मुई, यौं कथित कहै कबीर ॥

इति शरीर वृक्ष वर्णन

अथ संप्रदाय धर्मवर्णन—चौपाई

वेदमें दोय संप्रदा जानी ।यक श्री यक शंकरी बखानी ॥ श्री सम्प्रदा विष्णुकी होई ।शिव सम्प्रदा शंकरी सोई ॥ दोहुमें चार चार विधि भाखो ।न्यारो न्यारो नाम सो राखो ॥ प्रथमें विष्णु सम्प्रदा कहिये ।चार भाग पुनि तामें लहिये ॥ प्रथमें श्री संप्रदा बखानो ।रामानुज आचार्य मानो ॥ द्वितिये शिव संप्रदा प्रचारी ।विष्णु श्याम ताके आचारी ॥ तृतिये ब्रह्म संप्रदा साका ।माधवानंद आचार्य जाका ॥ सनकादि संप्रदा चतुर्थे ।निबादित्य अचार्य पुछे ॥ प्रथम कहो श्रीसत अर्थाई ।रामानुजकी कथा सुनाई ॥

इति