भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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आगमनिगमबोध

( २५ )

अथ रामानुजजीकी कथा-चौपाई

होन लगी जब धर्मकी हानी । शेषते तब कह शारंग पानी ॥ धरणी जाय धरो औतारा । करो तहाँ श्रुति धर्म प्रचारा ॥ भगवतकी जब आज्ञा पाये । तब धरणी धर धरणी आये ॥ केशव यज्जवा विप्र कहाऊ । कान्तिमती माताको नाऊ ॥ ताके गृहमें सो तनधारी । धर्म धुरंधर परम अचारी ॥ आठ सौ वर्षके ऊपर होने । कांचिपुरीके उत्तर कोने ॥ देश उडीसे के दिश लच्छिन । भूत नगरी औतार धरे तिन ॥ जक्त माँह आचार चलाये । पुनि पुरुषोत्तम पुरमें आये ॥ तहाँ जाय निज मनहि विचारा । जगन्नाथमें चले अचारा ॥ जगन्नाथ नहि मान्यौ सोई । मेरे पुर आचार न होई ॥ तब हरि ऐसी कीन्ह उपाई । रामानुज कह लियौ उठाई ॥ निज पुरते रात्रिके माही । धर दियो रंग पुरीमें ताही ॥ रामानुज को निजु अस्थाना । तोतादरी दक्षिणमें जाना ॥ एकसौ बीस वर्षलों जीये । गुरु पीढी इमि वर्णन कीये ॥

इति

अथ रामानुजजीकी गुरुपीढी वर्णन

दोहा-प्रथमें नारायण कहो, द्वितिये लक्ष्मी जान । विश्वसेन तृतीय कहो, पुनिसठकोप बखान ॥ पञ्चम श्रीनाथो कहो, पुंडरीकाक्ष है षष्ठ । राममिश्र सतयें कहे, यमुना चारय अष्ट ॥ नौमें पूर्णाचार्य है, रामानुज है तासु । ग्यारहें देवाचार्य है, हरियानन्द है जासु ॥ तासु राघवानन्दजी, ताके रामानन्द । पन्द्रहें रामानन्दके, शिष्य अनन्तानन्द ॥