भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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बोधसगार

अच्युत गोत्र शुक्ल वर्ण हरिनाम अहार परमहंस ऋषि नारायण पार्षद अथर्वण वेद माधवाचार्य वैष्णव ।

इति

अथ सनकादिक संप्रदायवर्णन—चौपाई

चौथी संप्रदाय सनकादिक । निंबादित आचार्यमरयादिक ॥ अरुण ऋषीधर द्विजकुल टेरा । निकट गोदावरि नय मुंगेरा ॥ धर्म वशिष्ठ द्वैत सो धारा । अहि कुंडलनहिं अहितेन्यारा ॥ जग ईश्वर नहिं भिन्न रहाई । सदाकाल दोहुकी यकताई ॥ गुरु पीठी यहि भांति बतायन । प्रथम हंस औतार नरायन ॥ पुनि सनकादिक नारद कहिये । चौथे निम्बादित को लहिये ॥ निम्बादितसे लेखा ठनिये । पैतिसपिदिरिब्यासलोगनिये ॥ भये प्रतापवान हरिब्यासा । ताते भल यह धर्म प्रकाशा ॥ जो हरि ब्यासके शाखा भैऊ । नाम तासु हरिब्यासी कहेऊ ॥ सो भूराम हरि ब्यासके अंशा । ताहूको गुन अधिक प्रसंशा ॥ पुनि हरिब्यास ते लेख लगाई । संवत उन्नीस सो तेरह ताई ॥ बारह पीठी गई सिराई । माखनदास देह तब पाई ॥

इति

अथ सनकादिक संप्रदायके धाम क्षेत्र वार्ता

मथुरा धर्मशाला क्षेत्र गोमती वृन्दावन सुखविलास गोर्वधन परिक्रमा द्वारावती धाम रुक्मिणी इष्टगोपालउपासी वंशगोपाल मंत्र गोपाल गायत्री हंस शाखा सारूप्य मुक्ति नासिका द्वारा सनकादिक आचार्य नारद मुनि दुर्वासा ऋषि गरुडदेवता साम वेद श्रीभद्र महाप्रसाद अच्युत गोत्र शुक्लवर्ण हरिनाम अहार निंबादित वैष्णव ॥