कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1758, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ें( ३६ )
बोधसागर
कौन पुरुषको सुमिरो नामा । कहौ कहाँ अबिचलनिजुधामा ॥ कहौ ध्यान कीजै किहि केरा । तन छूटे कह होय बसेरा ॥ रामानंद कहै सुनु पूता । गुरुसुख ज्ञान रहो संयुक्ता ॥ आपै पुरुष आप है नारी । कहो ज्ञान चित्तराख संभारी ॥ सुमिरहु दशरथ सुत श्रीरामा । अवधपुरी अविचलनिजधामा ॥ श्याम स्वरूप ध्यानमन धारो । तन छूटे बैकुण्ठ सिधारो ॥ कहै कबीर सुनो गुरुदेवा । यह समुझाय कहो मोहिभेवा ॥ रामचन्द्र त्रेतामें भयऊ । काहुहुखाय काहु सुख दयऊ ॥ लोभमोह जुत वन वन डोला । तत्त्वप्रकृत संगतितिहि बोला ॥ जौन बाटते रघुपति आये । सूत कौशल्याको कहलाये ॥ जब त्रेता तब राम भुवारा । कौन पुरुषको सकलपसारा ॥
सारखी-अहो गुरु समुझाइये, कोहै सिरजन हार ।
रामचन्द्र गुरु बंदेउ, कौन नाम आधार ॥
चौपाई.
कहत निगम अस करे विचारा । पूर्व अवर्न जन्मसो न्यारा ॥ तात मात बंधु सो नहिं ताही । ना वह आवै ना वह जाही ॥ श्याम श्वेत नहिं कहिये ताही । इन्द्रासन बैकुण्ठ न जाही ॥ तीन लोक सब परलय होई । निजु धाम कहो कहाँ है सोई ॥ स्वर्ग लोक तुम राखी आशा । फिरि फिरि होय गर्भमें वासा ॥
सारखी-स्वर्गनरक न्यारा, सो मोहि देहु चिह्नाय ।
कहवाते जीव आयेऊ, कहोगुरु समुझाय ॥
चौपाई
सुनहु कबीर कहो सो गहहु । करिये योग अमर है रहहु ॥ आसन साधहु बांधहु मूला । अष्टकमलदल निरखहु फूला ॥