कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1759, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ेंआगमनियमबोध
( ३७ )
चन्द सूर गहि कीजै मेला । मन पौना शुभ निधर खेला ॥ चढ़ि अकाश अमृत रसपीवो । तब कबीर तुम युग युग जीवो ॥
साखी-स्वर्ग नरकते न्यारा, ज्योतिपुरुष निर्वाण ।
तहवाँसे जीव आइया, कहो गुरु सहिदान ॥
चौपाई
कहै कबीर सुनो हो स्वामी । तुम हो उत्तगुरु अन्तरजामी ॥ योगके किये अमर जो होई । तौ पुनि योगी मरे न कोई ॥ का भो साथे आसन मूला । जौं नहिं मेटे संशय झूला ॥ का भो अष्टकमलके पेखे । जौं नहिं आप रूप निजु देखे ॥ का भो चन्द सूरके मेला । जौं नहिं शब्दसुरति गहि खेला ॥ का भो सुष्मनि जाय समाये । जौं नाहीं अक्षर लखि पाये ॥ क्याअकाश चढ़ि अमृत पीये । जौं नहिं नाम अभी चित दीये ॥ ज्योति स्वरूपी पुरुष बतायहु । ज्योति काल तीनों पुरुषायहु ॥ यहिजिव नाहिं ज्योतिसे आवा । परम ज्योतिसे अंश उपावा ॥ जो जिव ज्योति पुरुषते होई । नौ काहे जिव जाय विगोई ॥ ज्योति निरंजन काल अन्याई । सिद्धि तपी सब धीरधरिखाई ॥
साखी-ब्रह्मा विष्णु महेश्वर, सुर नर मुनि सब झार ।
ज्योति निरंजन सब कहे, खायो बारंबार ॥
चौपाई
जाहि कहत हो पुरुष निर्वाण । वही आहि तौ काल देवाना ॥
साखी-योग यज्ञ जपतीरथ, यह सब यमके जाल ।
कहै कबीर सतनामबिन, कबहु न छोड़ै काल ॥
पाँच तीन जहवां नहिं, नहीं प्रकृत प्रवेश ।
रविशशिपानीपौननहिं, तहँको कहो सँदेश ॥